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Full text of "Moolaradhana"

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क थ टी अर्थ--जिन्दो हारा कर्मकर ग्रहण होता हे एसे मन, बचन ब शरीरके हारा दनेवादी क्रियार्थः 0 
। का त्याग-परहार करना उसको चास्त् ददते द । यस्त॒त गाथाम जो सयम श्ट हं बह . चारिका. वचर ६ । {७ ' 
अन्य आचार्योनि भी चाखिका रक्षण ‹ कमदानानेमि्करियोपरमे ज्ञानवत्ास्त्र, इति ' पसा कदा द. इसका भी |, 
( आभ्य उरक समानदी ह जो चासिकौ आराधना कते ट उनको नियमते-जवदव तपकी भी आरधना टी [|-१' 
(|| जाी हे । इम आराधना खस्म निभ्रकारते समद्षना चादिये 1 - ९, 
¢ अनशन -चार यक्रारके आदारोका त्याग करना इसको अनटन कहते ह । यह अनयान तीन प्रकारका दं । 8, 
धः || मे भोजन करु, भोजन कएड! भोजन करनेवालेको लुमति देउ दस तरद मनम संकल्प करना. मे आद्र ठता | ‰' 
|| ह स भोजन कर, तुम पकराथो दसा बोटना. चार प्रकारके आदारको सकलपपूैक दरीरसे ग्रहण करना, दासे |. 
| सार करे दमो ग्रहण करने प्रहृत करना, आदार ग्रहण करनेके कार्यम रारीरते सम्मति देना एेमौ जो | \! 
||| मन, वचन, कायकी कर्मग्रण करनेमे निमित देनिवाटी 7 क्रियां उना स्याग करना उसको अनशन कहत द. [५ 
1 पा दी दै. वृष परनेवारा, द उत्पत करनेवाला सा जो आदार उसका मन, वचन, कायकेः तीन | 
1 त्याग करना अवमे ६, अर्थाद्‌ स्वयं पेट पूर्णं भरेगा इतना आदार म ग्रहण वरमा, कराईेगा, करन्‌ | {4 
1 चाठेको सम्मति मदान करा ते मन वचन य॒रीरके सेकस्पका त्याम्‌ फरना इङो अवमोदरय कते दै [१ 
५४|| आहारे अभिखापाको जीतना-इतने परो, गहटीम्‌ आदार मिठेगा तो ठेडगा इत्यादि भ्रस्ता फरके आहारा [ {९ 
४ भिलापाको जीतना इसको इृत्तिपरिसंस्यान कते ई. रसविपयङ़ी ठषटताको मन॒चचन शरीरके संकट्पसे | !१; | 
| चागना एसपरित्याग्‌ नामका तप ई. शरीर्को सुख मिरे एमी भावनाको त्यागना काये तम दै. चित्तम १ 
# 
॥ ष 4. भगा देना न" + भ नद्यो इमरिवि सखी, पलु, द चिवनित्र एकान्त स्थानम ५ 
1 अयने द्वारा द्वे अयो छिपनेकी कोके न करना, थपराप हो मया तो शध उसका न्विदन | 
१ 1 सखत.कं दारा पिय गये अभ योगसे परघ्् होना अधीव मेरे अपराध मिथ्या दोव [| 
1 क करना परतिक्रमण ह, अपराधोको न्‌ छिपाना तथा अञचुम योगेसि प्रधृ लेना चद तदुभय [१ 
& स पदाधके अवरंबसे अचयु प्रिणाम दते द उनको त्यागना अथवा उनपते खयं दूर दोना यद विक 01 








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तप दै, देदमेसे ममत्व-स्नेह दर करना कायात्सर्गं तप दै.अनशादिकको तय कहते दै. यह तप दौोपाक्ा नाश करनेके 
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किए गुरने दिया हुवा यायथित्त स्वरूप है, असयमसे तिरस्कार उत्प होवे स्स र्थि दीक्षाके दिन कम करना 
छेद तप है. पुनः दीक्षा देना उसके मू तप कहते है, ये सव्र आयाधित् तपके भेद दै, अदयम कियाय ज्ञान ददन 
इनके अतीचार दै, इनको हटाना विनय तप॒ ई चाख्तरके कारणाकी सम्मति देना इसको वैयावृल्य' 


~ 1 देसा कहा गया दै, बह केसा १ एसा प्रभ 
होनेषर ‹ संयममारार्धतेण एसा दोपोद्षात क्या है " सा जो अन्य विदान्‌ कहते दै, वह युक्ते संगत मदी 
दीखता दै. भ्यो आचार्थने ‹ चाखि्राराधनामे तप आराधनाकी पिद होती है  रेसा वाक्य घरमे कदा नदीं ६. 
तो आप उन्दने कदा है देसा क्यों कदते ह ! यादि ^ बरिदिया य हवे चरित्तम्मि * इस वचनके द्वारा उन्दने कहा 
हे फेसा कदोगे तो यह कहना अशब्दार्थं है, अर्थात्‌ ' चाखराराधन्मे तप॒ आराधनाकी रिद्धि होती है रेस शब्द 
गाथाम नदीं है, शब्दके दवारा जो अनुभव अगा उसकोदी ' कहा गया है ' एसा कहना चाहिये, 


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या<व्‌क्द्‌ चुकहतो किर प पृनः वनक्टो त बहना? णमा प्रभक्तनानी लयृक्त टं । पयोः ११ 
मरत्रमं चावि सिद्धिम्‌ दतर भागधनातिद्ध तमा उपन्यान-्वियन नेद द्िपाह, 


1 जार दपर प्रतिनत्ति 
अत्रो अथा नगय ग्रस्रफो यम्तुरा स्यस्प यान नद दना ई देम वाग्ने पटक्रमारय्मा वृजिन बदा 
पृटना योग्य नदी ह । 

यदा मयमृके िपयमे भीर ज प्ििचन भन्य पिद्रानाने किपादटृदह भी मोम्पना 
मकार चाप्त सरा परयन्न कना वह मयम ई मद्र यम्‌ याय तपने म्यत 
ग्राप्न दयता र. उमः विना हता नह, सतव सयम पराद्य च म्बत तपने युगस्देन दाना ण्नामानना पेमा " 
यद संयम स्र्प विचरन योन्य नदे। ६, तग प्रकागदधे चाननिमे यन्न ग्ना उनन्त मयम कलने ६ एना मयम 
य॒न्टका अथ नी ६, जपने जो जमिघ्राय कदा { उमे मयम यन्द प्रपोन पिपा मा एदा भी हमा देखने 
सुननेमे नदी आवा टै, दव्टका अर्थं बार बार परसो नेनि नाभि ता £ एन्‌ तेरा यदास चानन श्रवन 
करना यद सयम द गा यचदप्रयोग कदा भी यायान 
| ^ विदियायद्ध चरित्तम्मि ! श्न यत्रमे चागति श्रन्द सामनी ६ पतु आप्‌ ' मङ्लचागि 
एमा चाग्नि गन्दा वरिि्टा्ं कयो कटने ६१ नामाविक, दद्रोपम्यापनादि मद्रस् नाखिभिदोसे चाग्तरिगघना 
कटे ई ‹ पाट्दपाट्दमगण सीणफ़माया मराति पयलिणो ग दल मुम सथा र्न्यातवान्नर समप्नना उनद्धा जामे 
वणन करम्‌" बाद तपे मस्कागने यक्त एमे अभवत्‌ तपरे पिना नयम नकटा दय प्रहता भी युर्िमृक्तः 
नहा. रयो बाह्म तपे शनर्णािना भी जादि भगवतः भ्रप्व भर्णराज यमे मनन चनव पू अन्त- 
खटृतम रत्नत्रयकते पाका मोधको गये ट एमा आगमे प्रमिद्‌ उख ५, 
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ननु त परस्पायत्तनिञ्चरानुश्रमण निन्ररामुपगस्छन्ति सति यमाभि यदा नि रोयाण्पपरनानि नपा; 
^ स (न ५ (= (त णे ५ भ्‌ = गि पान्स 
स्वारध्यरप निरयाणमुपजायने नतो निर्वाणम्य याणं मित्य, 


नो , हि किः 
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० सम्याभय मपरादकः सप्स्सो शुक्त द्रतनायधना सत ; ¢ 

भाराथना चति दरिमिधा माराधनेति गद्धितु त्पारफाया तपो निर्भय सुष्टग्तगणा फरामि =" ध | 
~ (= @ ५ ४ १ # | ।1 भे ९ । 

नान्येति पदृ्यति-- यु््डयुना करानि मति चासति सपरसाियि ध 


मूलाराषना 


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सम्मादिष्टिस्स वि अविरदस्स ण तवो महागुणो होदि ॥ 
होदि हु हत्थिण्हाणं चुदच्चदगव त तस्स ॥ ७ ॥ 

विजयोदया-सम्मादिहस्स वि त्यादिना । सम्मादरिहृस्सवि तत्वार्थशद्धानवतोऽपि । यचिरदस्स असयतस्य 1 

न तवो तपः । मदाग॒णो यणशब्दोऽनेक।धदृत्ति, । रूपादयो गाणशब्देनोच्यन्ते कविद्यधा-रूपरसगंघस्पशंसंख्यापरि- 
माणानि, पृथक्त्व, सयोगविभागो, परत्वपपरत्ववुद्धय., उलट खेच्छद्धेपभ्रयत्नाद्य. प्ियावद्ुणस्मवायिकारणं नव्यं ' 
श्त्यसिन्सतर गृहीता ॥ गुणभूता वयमत्र नगरे ति अघर प्रधानवाचीयस्य गुणस्य भावादिति विकषेषेण वर्तते ! शणोभ्नेन 
कृत इत्यत्र उपकासार्थे बृत्ति, । इद उपकारे वर्तमानो गृह्यते ! महागुण. उपकासेऽसति मदयगुण । होदि भवति । श्या 
चेव हि भाव्यते न्पिव्यते वा एति वचनात्‌ । न तु भवनक्रिया सवध्यते । तपो न भवति मदोपकरारमिति। पतदुक्त, भवृति 
कमनिरलन कर्ठ॑मसमर्थं तप॒ सम्यण्दषटेरप्यसंयतस्य पुनरितरस्य असति सवर प्रतिसमयघुपचीयमानकर्मैसं दते 
फा मुक्ति १ ननु सत्यपि संयमे विना निर्जरा न निदृत्तिरितिः । शकयमेवमप्यभिधातुं “ सम्मादिहस्स चि अकदतवो 
भावणाविसेसस्स न चास्ति महाय॒ण दोदितति! सत्यमेवमेतत्‌ चारित््रधन्ावेवक्षपस इथ चोदना । असि- 

| दिच्छनत्तीत्यत्र छेन्तारम॑तरेण असिनेव सपद्यते छिदा, तथा तदीथतैङ्ण्यगौरवक।न्य तिश धनिरूपणवाछया तस्व 
खाय निगद्यते । एवमिद्दापीति न दोप । कुत ? यसखात्‌ होदि खु दप्थिण्डाण होदि भवति। खु शब्द्‌ एवकायार्थ' 
स हत्थिण्टाणमित्यनेन सवधनीय. । इत्थिण्डाणमेवेति । यथा हस्ती खरातोऽपि न नेमस्य वहति पुनरपि करावजित 
पाुपटलमटिनतया ' तद्वत्तपसा निर्जरणिऽपि कादि वहुतरादान यसयममुखेनेति मन्यते । र्टान्तन्तरमाच-खुद्च्चु 
द्गव मथनचभपालिकिव तढत्लयमदीन तप. । द्टतद्वयोपन्यासः किमयै इति चेत्‌ । अपगताद्वहुतसेपादान कमणो 
ऽसयमनिमित्तस्येति परदश्ैनाय दस्तिस्नानोपन्यास । आद्रैतचतया बहुतसुषादृत्ते रज" । चधरद्ित। निस स्वास्थ्य 
प्रापयति नेतरा चंधसटमाविनीति । किमिव मथनचमपाछिकेव । सए दि वधसदिता सुति वतेयति । अचान्ये व्याचक्षते- 
कालमेद्मन्पेषय शुद्धिमश्ाद च दुरौयता प्रथम उपात्तः । तद्युक्त खकककमौपायो दि यद्धि, यशद्धि् क्मेणा सददृत्तिः, 
तत्रासती शद्धः कथमाद्य॑ते कर्मशापगममाच्रतः शयुद्धिव या मुक्तिः सा कस्य न विधते ¢ फट द्त्वा प्रयात्यत्मनुः 
कमपुद्रलस्कधा. । यच्चोक्तं यदा तु कालभेदेन वैधर्म्यमादक्यते वधनशातनयोरेकसमयत्वात्‌ इति ततो द्वितीयो 


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शमानन चामलोचनायाः निशानाथस्य कदाेदेव पूणता ततो ऽचुमानमिति  साधारणधममाच्ावंवन पवोपमानोषमेय 
भावः, वध्यं तपमानोपमेययोरस्ति अन्यथ। उपमानभिद्‌ . उपभ्रेयमिति मेदो निसस्पद. । अपि च उपमयस्यातिशय 
भवशयिवुमेबोपमानं प्रवृत्तं ॥ न व्वेकस्योपमानस्यालुक्तताद्ेरितर्दुपादीयते इति युक्तम्‌ । 





द्टातः 1 रज्युवे्टननिगैमनयोरेककारुत्वादिति तदप्यसारं । न हि चेद्रमुखी कभ्या इत्यत्र एवमादोक। सभवति, सदा सपृ - 


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ध नलु य॒ ~ कारण निजस्व तत्कारण च तप दति सम्यक्त्वाराधना वप आराधना चेति सक्षिप्य चरतु युत । ५ 
भू 161 [ वन स्मर रिणि चरित्र सत्येव निवणाचुगुणाया निं्रायास्तपसा कु शक्यत्वात्‌ । तदेवाद-- ¦ { 
१ पि पि ः भो ‡ 

९८ {| _ . भूलारा-सम्मादिद्धस्त वि । तच्श्दधानवतोऽपि किं पुनिण्याटरित्यतिदायोऽगिर्दा्यः । अविरदस्स हिसखादिपु 01 

२८: | ्विपयपु च प्रवतमानस्व । महागुणो अनल्पोपकारं कर्मनिमूठनमर्थीभित्यर्थ. | सयमदीनस्य सवराभावे प्रतिश्षणमपरापरः 14 

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फमसप्रातापद्नान्सुक्तिन स्वादिति भाव. । एनचारित्रस्य भ्राधान्यधिवद्षायामेवोच्यमे । यथा ^ मुक्ति्तपतैव त्प कार्यमि 

[ष ए भ 

ति तपस भधान्यविवक्षाया । सु भेदविवक्षाया दवार्थे अभेद्बरिव ष्वाया बा ण्वार्ये। 

योनय ॥ यवा दएस्ती स्तावः सनन्रतनुतया स्वकरार्पितं रलो वटूतरमादत्ते तथा 
© #^~ म ५ 

पुमयुक्त्यादिटपरटतया वहुठरमादतते एत्य; ॥ युदटुटर्मव मथनचर्मपालिकेव । तं 


प. [न्क 


~~~ एठः 


दस्तिस्नानमिव अर्सयतस्य तपो भवतीति 
तपसा निर्जी्भक्माशोऽसयमापितं कर्म 
तत्तपः । तस्स सम्यग्टष्टेरप्यविरतस्य | 


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~ +). नद 
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(ऋ 3 य, 2 1 




















‡| यथा वेष्टनस्मा्यदटनं छनोणा जाकर्पणचर्मवदूध्िका भमिधव्स्य ख न फसेति तथा वंधसष्टभाविर्नीं निज्नरा ुर्वघ्पोऽ (|: 
{ „+ ५ ७ ५ € र भ [| [अ ५ ५ क (र 
1२. 1 अ दस्विसनानेनापगवाद्ुतरस्यापाद्नं चभवद्प्िकया च वैघसदमाविन्या निन्नरया || ५; 
५; स्वारूयाभावो दशयते । उपमेयगताविदायफटत्वादषटान्वान्तरोपन्यास ठ त्य । यु चुदिदकर्मेति पठन्ति तेपाभियं व्यास्या (1 
\॥ यदं मानकरसेा तपार्ियोगव काठ टिदन्वि चिकीर्िववस्त्वसुराणमावेन ईतदीति चृदारिः तेपा कर्म व्यापारचधर्म- 1 
४ यूलिया भरमिपरिधमणं । व्यथा सुशब्डेन यथायेनोभयत्र सधात । शेप पूर्ववत्‌ ॥ ४ 
\९1 [9 = आधीन ॥ [3 © + #* =, श ~© न (~ [शा (भ (0 
१५) [नसतस्‌ तपक्र ६ तथा वदयमानकम्‌ इस तपक प्रभावसे रमसे निर्नाणिं दता द. जव सपण क्म |; 
9, | नि.येपदहो जाता ~ ४ च | 
| (यमद्य नाता £ तव स्वास्ण्य रूप मोक्ष गराप्न दोता है. अतः मोपका कारण निर्जरा दी ६. बद निर्यरा तपसे ष 
८१५ दा ठ" अतः दयनाराधना व तपभआरधना दसी दो आराधना्ओंका वर्णन करना योग्य हे देसी शंका दोनेपर 
र न म 9 [*। ¢^ ^ (न + 
५९ सतर्क उपन्न स्नव ब्‌ चाल सहायक सनस हि तप सुक्तोको साधक एसी निर्जरा उत्पन्ने कर सक्ता द अन्यथा ॥ 
;9\ | नक्ष एसा उच्चर निम्न रिखित गायामे देते है-- । ध 
| _ दी ज्ध--जीवादि तत्वोपर जिसकी शरदा ह रेते अविरत अर्थात्‌ असंयमी पपका तय महान्‌ उपकार ॥ ५4; 
‡९\ | करनबाटा नही होता द्‌. बद्‌ उसका तप हार्थकिः लान ममान होता ६, सरे म >“ (14) 
६९; ६.५३ क ध ॐ ५ ध ^" तपु दाः क “ ॐ, च्य ० दाता ४ नम॒ दाथी सनि # ह परतु ४ ? 
{| (र्‌ च्टपर जाकर जपन चढन सवीगप्र धूलि फेफता है से असंयत सम्यग्टि कर्म निनी करवा ह्वा भी { ५ | 
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सूटाराधनां 





८ {2 9 (2 ट 2 ध 5 ध प 2 ब 
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असंयमके द्वारा वहुत कर्मका ग्रहण करता है, अथवा ठकर्मको द्र पाडनेवाला चमौ जैसा छेद पाते 
समय दोर वांधकर घुमाते ह उस समय उसकी दोरी एक तरफसे दी दती हृ सी दूसरी तरफते 
उसको र्द वद्ध करती द वैसे सम्यण्चीका पूर्ववद्ध कम निर्जरणं होता हुवा उसी समय असंयम दारा नवीन 
कर्म चथ जाता है, अतः असयत सम्पण्टटीको तप आराधना नदीं होती है. इसङियि तय आराधनामे चाखिाराधना 
सतरभुव नदीं होती दै देसा सम्चना चाद्ये, कि 
विरेष--गाथामे ' महागुणो ' रेसा शब्द है, यं गुणशव्दके अनेक अर्थं दोतते दै. जेसे स्म, रस्‌, 
शध, स्प इनको भी शास्त गुणसंज्ञा दै. गुर्णोदी संख्या दिखानेवाला घर इसयकार ह.  सूपरस्गंघस्पशाः 
संख्याः परिमाणानि प्रथक्त्वं संयोगविभागौ प्रत्नापरत्वबदधयः खखदुःखेच्छादेपप्रयतनादयः ' कचिद्‌ शुणक्रा 
अर्थं ख्य एेता भी होता दै, जेसे-‹ गुणीभूता वयमत्र नगरे ” अयौत्‌ इ नगरमे दम प्रधानः यख्य है. यदा 


अथीत्‌ इसने उपकार किया. परकृत गाथामें गुणरब्द्का अर्थं उपकार एसा समननना चाहिये, अबिरत सम्यग्टिका 
भी तप महागुण नदीं रोता दै अथी बद कम निर्मूलन करनेके ल्यि समर्थं नदीं होता है, पुनः जे मिथ्यादृष्टि 
हे उसका तप क्तिकेरिये केसा कारण दोगा १ उसको संवर न होनेसे प्रतिसमय नया कमे आता दी र्देगा 
अतः उसके शक्ति नदीं होगी. 

दका-संयम प्राप भी होगथा तो भी कर्मनिर्जरान हौनेसे शक्ति नदीं प्राप्न होगी, अथवा 
रसा भी कह सकते जिसने तपका अम्यास किया नहीं है एसे सम्यण्ट्टीको भी केवल चासि महोपकारक 
नीं हता ६, अथात्‌ संवरसदित निर्जराको उत्पन्न नदीं करता दै. 

उत्तर--आपका कहना ठीक £. परंतु दां चार्त्रिकी श्रुख्यता दै अतः चासि न नेसे युक्ति पप्र 
नी होगी रेसा कृश है, जैसे “ असिरिच्छनत्ति अथात्‌ तरवार काटती दै. इस वाक्यका त्रिमद कग तो एसा 


माद्र सगा फि, ठेदनेवाले पुरुपके पिना केवर तरवार दी स्वयं छेदनका्य नही करेगी परंतु तरवारकी तीक्षणता; 


कारिन्य चरे गुणातिशयको देखकर्‌ उसमे छेदनकार्य फरनेका करैत आरोपित करके तरवार तोऽती है देखा 
कःते है. वैसे चारिका वर्णन करनेकी शुख्यता रहोनेसे चाखिके विना तप महोपकारक संवर निजराका उत्पादकः 


2.५१ ^ 
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कसचन || नदी दोते दै एसा कह सवते दै, व 
४, ॥8 संयत सम्यदृष्टिका तप दस्तिस्नानके समान दै. जसे हाथी ताठावभे स्नान कर निमल होता है प्रतु 
|| अनीके दारा धूलको शरीरपर पककर अपनेको मरिन करता है, तदत्‌ तपके दारा कमश नि्जीर्णं दो 
| गया तो भी असंयमसे सम्यदषटि बहुत कर्स्दायको अरण करता ई, 
( आचायै दुसरा च्छान्त संथन चर्मपालिकाका देते दै, उसका पिेचन किया दै, आचार्ैने दो च्छन्त | त 
ध भय दे दै १ इसका खुलासा इष यकार रै, समय परमे जितनी क निवरा की ह उसे भी अधिक क॑ || 


323 


|, यहा दूसर विदान एसा कहते द--“ कारभेद्की अपेक्षा न करके शुद्धि ओर अञ्ुद्धिफो दिखानेकी 
| इच्छसे आचा्ने प्रथम  उदाहृरण-इस्तिस्नानका गामे छा ६, ” परंतु यह उनका अभिप्राय युक्ति 
क्त नही द, करयोकि, सपू कर्मोका नाय होना यह शद दै व करम सदितावस्थादी अञि ह जव श्धिरंदी ||| 
नदी तो आचायं उसको दस्तस्नानका उदाहरण देकर भी कै दिखा सर्वेग, दि इछ कर्म नष्ट होना उसको 

यद्धि या क्ति करगे तो देसी घ॒द्ि किस पराणी न मिकेगी १ अथौत्‌ एेती शुद्धि लेक गाणी विमान 
क उसको फर दे देकर सिरतेदी दै. अतः देसी शुद्धि मिलना असंभव न दै, बह 

सुलभ दा ६, 

, ओर्‌ भी जो उन बिद्वानोनि कडा है ‹ जहां कारभेदका श्रय केकर दो धर्मं रहते ह 
वदां उन धर्मम भिन्रता-यिरुद्रता दीखती है, परेतु कमथ दोनाव उसदी निर्जरा दोनाये दो धरम 
एवः समयमे ते है अतः ये मिरु नदीं दै, इस बस्ते यडा दुसरा चात मथन वर्मपालिकाका दिया ह, यं 
र्यसे मेथनरदंड वेष्टित भी हो जाता ई ओर युक्त भी 


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दो जाता दै, ये दोन क्रियं एक समयमे होवीं हई |; 


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अतः इसमे वेध्यं नही दे, यह कहना भी असार ह. ' चंदली कन्या ' इस॒ उदाहरणे रेस वेधम्यक्षी छंका 
उपस्थित नदीं होती.कन्याका यख दभेदा पूर्ण दी रहता द, परत चदरकी परणता कदाचित्र्‌ दोती ईं, सटा नी हेती 
अतः जमाने, यख आर चद्रमे साधारण धर्म-आद्दादकलत्, सुद्रता इत्याटिकरा आभ्रेय लेकर उपमानोपमेय भाव 
रहता दै. सख आर चंद्र च वेध्यं हे ही अन्यथा चद उपमान द॑ ब ख. उपमेय ६ यद भेददी उर्यम्‌ नदी ददा. .उय- 


न 9 ०७») ००69 नि ४ कक + समीरः 4 क 6 पकर 1) तक शं, ०७०7 


>> "द 4 वि ^ कि = 


भ 6 ०९4 ए = ¢ = र == ^~ 








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भेये. वि पिरेपता दिसानके दिये घी उपमान -मदृत् शेता ई, उपमानको छोटकफर दुसरेका ग्रहण कोद नीं करते £, 
तातपय--मंथनचपालिका का उदाहरण दनेका कारण टतनादी यदा सम॒ना चाय कि, अवितसम्यर्ट्ीका तप 
असंयमपूर्वक हीनेसे कर्मबध यर निर्जराका कारण ६, वधर्य दिखानेक्रे सिये थचार्थने यई उगदरण नी दियाह, 


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सक्षपस्य ध्रकारान्तरास्यानायाद-- 
अहवा चारित्ताराहणाए आराहियं हवद्‌ सच्चं ॥ 
आराहणाए सेसस्स चारित्ताराहणा भग्ना ॥ ८ ॥ 
विजयोदया--अद्वेति । .पकट वादिसस्ययालस्ययाननरूपेण दि अनी निरूपणा ॥ चरति याति तन दितधाप् 
अदितनिवारण च चेति चारि, चयने सेव्यते सञ्जनरिति चा चारिप्र सामाधेषगाद्रिक, तस्याराधनाया तत्परिणततौ सत्या 
आराधित्‌ निष्पादित । दद्‌ भवति । सव्य सर्वं पान ददान तपश्च, श्रकारकात्स्न्य सर्वदाष्टोऽच्र प्रदत्तः । यथा स्वभोदन 
सके एति बीदिणाव्यादन्रकारदूत्सयं | सुलित्रियायाः कमेत्वेन तीयते ! पचमिद्दापि सुपरत्युपाय्रफासपणा प्रानपरीना 
सामस्त्यमाख्ायते । चारितराराधनेकेचत्यनेन गाथादधेन फयितम्‌ | , अत्रवमालच्ता--पस्मादिरत्वनिनूपणायधनायाय्यारि्न- 
मुखेनैव करियते नान्यसुसेनेत्यत आद्--लाराधणाए धासधनाया । सेसस्स श्यस्य । एनदूगीनतपसरा अन्यतमस्य । चारि. 
स्तारधघणा ।भन्जा भाज्य विकटप्या } फथ ?२ भसयतसम्यग्टष्टिभिवति एानटशनयोरागा चको नतस्य. । मिध्याटष्टिस्त्वनथ- 
नदालु्यतोऽपि न चस्त्रिमाराधयतिं 1 का्चल्युन परनादीनि चारित्रमपि सपदयत्तीति नाविनामणवेता , इ्वससयध- 
नाया चारिघ्रासघनाया एतिन तन्मुबेनकत्वनिरूपणेति | भाव ॥ ननु यिफवीतसागतम्यक्त्वयधनाया, ध्ायिकसानार- 


[4 न ज 2 = ५ भ 9 स न 0 क १ नो त न 
11.11.112 071 व नन मि 


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चारित्र [र च दद्यानाद्धितं कायं हि  कारणायिनामाधित्य भ्रयुक्त इति साटुपपदचा * # प्रति प्ामायेण रि चि 
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इ्दनीं परमरसंक्षिपादेकयैवाराधना स्यादिति द्रीयति-- 0; 
४) मूलारा-चारिततारादणाए-चरन्ति यान्ति तेन हितभरापिमदितनिवारणं चेति, चर्यते सेज्यते स द्विस्तदितिवा चारि |£ 

|| सामाथिकदिकं । तत्परिणतौ सत्या जारादिदं ैप्पादिते । स्वं कान दशन दप । सेस ्ानादि्रयस्य भलया मान्या ||{4; 
|| विकर्पाः। तदयथा-असेयवसम्यग्दािानदशंनयोराराथको भवति नेतरयोः । भिध्यादृटिरनरानादितपस्युयतोऽपि न ४ 
(५ चारिजिमाराघयति । कश्चिखुनः ज्ञानादीनि चारित्रमपि संपादयति । ततो न च्ानादिसुखनैकत्वरुक्तमाराधानाया इति भावः; |£ 
%; || "पच्च क्षायिकवीततयागसम्यक्त्वर्केवलन्नानाच्चान्यत्र वोध्यम्‌ ॥ 








0; हिंदी अर्थ-चाखिकी आराधना करनेसे सर्व आराधनाओंकी आराधना दती है. परु दर्शनादि आराधनासे ॥‰ 

कः|| चाख्रिकौ आराधना दोगी था नदी भी होगी. 
र विेपाथ--एकः, दोन, तीन, संख्यात, असंख्यात अन॑ रूपसे श्री जिनेश्वर मतमे चस्तुका वर्णन होता है. 
अदः स्तक अपिश्य संक्षेप च विस्तार पूर्वक िरैचन चेन थमे पाया जाता दै. निससे जीव दितको प्रा हे ह 
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आराधनाय है दी परंतु जहां अन्य आराधनाय है वहां यह चारित्राराथना रहे या न र्दे. अतः चारितरिकी र्यतासे 
आचार्यने सवका अन्त्माबकरके एक चारितराराधनादी कदी ई, ६ 

दंका-क्षायिकवीतराग सम्यक्त्वाराधना ओर क्षायिकङ्ानाराथना एसे दौ आराधनाओंमे बाकीकी तप्‌ 
जर चारित्राराधनाये निधयसे अन्तर्भूत होती है अतः रेप आराधनाकी प्राप्ति हृदं तोभी चासिराराधना भाज्य है 
रसा क्यो कहा रै, ू 

उत्तर--क्षायोपश्चमिक ज्ञान ओर दरानकी अपेक्षासे हमारा उपर्युक्त कथन समञ्नना चाहिये, अथात्‌ 
जहां जां क्षायोपद्यमिक ज्ञान व दर्दोन है बहा चारित्र होता दी ह ठेसा नियम नदीं है, क्योकि क्षायोपद्चमिक 
ञान व दर्दान चतुर्थं गुणस्थानते श्रू दते रै. इस गुणस्थानमे अबिरतिपरिणाम रोनेसे चाखिाराधना नदीं है अतः 
आचार्यका कथन किस अयेक्षासे है थह ध्याने आया होमा. 

मरकृत गाथाप्र अन्य विद्वार्नोका आगे रिखा हुवा व्याख्यान रै--चार्ताराधणाए “ इस गाथाम 
चारित्र शव्दका अर्थ सासि रेता समस्नना चाहिय, सम्यग्दशेन युक्त व सम्यग्क्वान निरूपित एेसा जो आचरण 


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| कम उससे च्युत न होकर दढ रहनेका जो प्रयत्न उसको चासत्रि कहते दै. अर्थात्‌ आगमम जो धर्माचरणके क्रमका 
| उदलेख किया है उसके उपर श्रद्धा रखकर उसका स्वरूप समञ्च ठेनेके अन॑तर उस आचरणक्रमसे च्युत न हीकर 
` ४ [||| उसमे ट्ट रहना यह सचारिरिका रक्षण दै. फ चाखिकी आराधना करनेसे कान, द्रौन, तय इनी आराधना 
‰ || अव्य होती दै. चारि सम्यश्ानका कायं है, ओर ज्ञान भी सम्यग्द्चनके प्रभावसे दितकारक रोता ई. कार्य 
|| हमेदा कारणसे अविनाभावी होता दै, जो जो कार्यं उत्पन्न होता द बह २ कारणपूर्वक ही होता दै, कारणके 
| चिना होता दी नदींदै. चाछि ज्ञान व दर्शनका कायं दै ब सम्यण्द््न ्वानके साथ अबिनाभावी है, उनके 
{@;|| विना चाल्िकी उत्पत्ति दती दी नदी. अतः चारित्राराधनामें सव आराधनार्ओंका प्रवेश हो जाता दै. ” यहां 
|| आचार्य उनके व्याख्यानकी अयुक्तता दिखाति दै. 








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~ | । जयया फर्नच्पाकतस्यपस्पिनि मस्यषनष्यान ९१ { जापः 
2 [य्‌ र 3 ने ५ र ग~ ॥ &। 1 
र ग षति यक्तप्य मवति परिदरथान्दृस्य पुलगन्यात् 1 न पथं परिष्टीन "त चव य ५४ 
|| सोचेव वद्‌ णाणे पति गोग ह्यमीषां परिदाग््यारिद्मिन्य्तम्निय शारस्यान्तरटीन १{ 
‰; ध सयम , पाया, योग मिव द्रया ऽभिमनस्यासपनाय 8 
01|| मिच्यादृकतने, पान, ददन इ्ययपेति 1 चारिमासाधनायतिव मद १ 
| र ४५ * १] 3 
| ध सामान्यं चारि, पन य. ॥ - 0 
। 4; | चार्िासाधतैपत्वति स 
१२१ =. ५ + 1 १६४ 
19 सेत्रारधनाया सुनिद्द्नयारन्तमाव वाबददयपति $ पपच नेपर्प्ररणत्यान श्वि १८२ 
| ;9; | चारि [न न सनष | श्ण राप्त्पा ९ 1 भपस्य ४ [अ (त ^ र {५५ 
११! फायव्वमित्याद्ि। थव दे पटम्रटने । वित दस्मपुपादात प्य्यत्य रुष मिविघना्‌ 
९२ ॥ (२ (प {वाप का) + {- नृ. न 
[॥ } +~ भरपानस्य { परटि समन्पान्सन [ {तमा च्छ्य } शमु [सन्पणः ॥) [श्‌ 
ध णाद जात्या निच्ित्य भद - दन्दीत्यददिवत्‌ अघ्र दुरिच्पादानाय 1 <+ मिष्यादुरीनमिध्या- | ४, 
1 रीपदुजयरूपस्य भवति ॥ पररि रिष्ठा प्रसियिजने नष्पस्य न 
<: || परपद्‌रं ५ ॐ शति निधित्य राचमानस्य णा # = सपनी } भपायम्य ~ 
५4|| अकव्यं जानवर्ेधनिययनत्ा ० णमिषि खभयद्र प्लघ्धिगाररन्पापन ~ 
० द 4 न $ = 1 
4 ६ ध ट रमादिति पत्यान्तसामभ्याष्म्भे भषपानस्यति पपर 0" 
५" ४ ० ॐ भन + क + ई +. 
| {7/1 स 1 नादृवत्वत्र 1 ५ ‰~ 4 ५ भर नदुदानापाद्ूनादुनपट्न ६५, 
५१|| गदीत्यत् इत्साया पादपे वन सोभयतेद चारिजं । छ पेवत्याद्ि । स 0 
9; गरतीत्यत्र कः ज व न ग्यलन्‌ प्भयपम्मय भू. (= [न स्य प्मीमद्त्माग्य [111 [ल 
£ 2 नीयं | तथ कठन्योपादानमप वर्यपरि ५ . ि ट म ष भपरतीत्पपिनामापम्ासि ५ ॥ 
¢ ्राक्भिपरिद्ारपरिणवं चतन्यमेष द्रव्यायाव्यतिर्फान्न अ ी# 
19; त्र ऽन्तमघस्वयो. ॥ १ 
०0 द्र 1 न~~ [ष {+ 4 
|| चाव परान दसा टौ जाता ६ तका उर यपिनाभाय्‌ ठी | 
{4 ~ [8 - न दतर आद्रधना्याफ सन्‌ ५९५ स ^ = ॥ पर ८ ध ध + 
>, ; कथनस् ५. ५ हा लावा, प भरन्‌ ट पनर १२८६ 
८()५ वचात्रारघनाक । ९ म्याार्रम अन्तभाव्‌ । 4 01 ¢ 
174 ^ आगघनाताफा १९१ 
(|| देगा, अथद्‌ अपिनाभाव हेन्‌ प आगन ५6 
1 ५ (व ४ ति [) ^ प्रन ४ 
| ५ अन्तमो आभेरी गाया ऋ पादस 1 दोनके अनन्तर अक्तन्य फा त्याग करना च९ नाखि द | 
11 दी अध्‌-यद कान योग्य कायं ६ एमा क्वान १५ | ४६ 
10 ^ > = क 
¢| देसा स्य ग्छका यथै द. ६ उका व्याग पलना, छोदना रेस रं दवा £, म ^ परिदरति सपे प, 
{1 का--गाथा्मे परिदयर शव्द ई उसक ~ = 1 अथर्‌. अदः जो पदा पर्न ५९. 
शका--गाधाम धातूफा अपद्‌, जव ५ 
0; म सर्पका परिदार करता दै, उमसे दूर टोचा दै. एेसा परिदरति 
8 || इस चाक्यमे सपका परिदा ौ 
(1 
(4 


६ 


+ ५ 


-मूलाराधना 


9७ 


करने भोग्य है उसका श्वान होना दी वर्जनके स्यि उपयुक्त है. अतः यहां ेसा समञ्चना चादिये फि जो अकाय है 
उसको समन्ञकर छोड देना यह दी चाखत्र दै. करने योग्य क्या दै उसको जाननेकी इछ जस्त नहीं है, अवः 
आचार्थका लिखना व्यथ दे. 


38 


हन्तव्या " गौरम स्पव्या, इस वाक्यम गोवध नहीं करना चादि, गायको स्पद नदीं करना वाये इन वचाक्योमे 
मोरव्द सामान्य ६. पतु बिशेष अर्थम भी इसकी प्रचि होती दै, यथा-गारईयोकि समूदमे ग्वाला वैठा था उसके 
पास जाकर कोई मयुष्य ‹ मेरी गौ तूने देखी ६ क्या दसा पूछने रगा, इस वक्यमं गोक्ब्दं पिसिष्ट गायका वाचकः 


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त 5.45 ०.४ नदन = 
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५ 4 कु. 595; 9 [नभ १, ३ 
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है एसा मानना पगा, इषी तरह प्रकृत प्रकरणे परिहर शब्द त्यागसामान्य्‌ को विषय करता हुवा भी नियत- 


निधि से त्याज्य विपये त्यागमे थयु्त समहनना चूएदिय नियत रेते अनेक त्याज्य विपर्योका त्याग उनका . | 
वारवार शन हृषु विना अाक्य है, अत, त्याज्य पदार्थे मिथ्याद्न, मिथ्यल्ञान) असंयम, कूपाय, अञ्यमयोग | 


एसे अनेक मेद्‌ है. तथा इनके भी अनेकः विकस्य है. उनका सतत त्याग करना चाहिये. परंतु अक्को इरके 
मेद्‌ प्रमेद ज्ञात न दोनेसे वह उनका फसा त्याग करेगा ? 


दौका-क्ानचारििका अविनामाव दै यई * णादृण होदि परिदारो * इस व्यते अजुर आता है | 


अथीत्‌ यदाथका क्ञान दोनेके अनन्तर चाखि यता दै, परंतु श्रद्धानफा चार्के साथ अविनाभाव नदीं हे 


उत्तर-जो लान अथवा जो द्यनटै वे दोनो भी चेतन्यसूप दोनेसे अनिनाभाव्‌ युक्त द ह, 
अथीत्‌ चेतन्यदी क्न दै ओर चतन्यद्ी दरशन ३, ्रन्याथिक नयसे . चान ओर ददीनमे चेतनारूप 
ता दीनेसे एकरूपता-अभिनपना दै. अतः जसा चारिका ञानसे अविनाभाव है वेसा सम्यण्ददीनके साथ भी र, 
क्यो सम्यगद्न जाने अभिख दै. चारित्र दी ज्ञान ओर दुयीन है देसी कल्पना करने पैम क्षान नतर 
चासि होता ३ अर्थात्‌ पथम वस्तुका स्वरुप वह हेय ई या ग्राद्य है इसका निर्णय होता दै तदनतर ॒ग्रा्यका 
स्वीकार व त्याज्या त्याग एतत्स्वरूपी चासति दीता 2, एेसी जो सतरकारकी भेद कतो स म्रद्चितकी दे 
वद; चारि ४ ज्ञान दद्रेनमय है एेसी कल्पनाके अगे केसी टिकेमी, यहा विरुद्ता दोष उत्पन्न होगा तथा ¶त॑ चेव' 
एसा जो नधूसकरतिग शब्दै बह योग्य न दोगा, कारण परिदार शब्दे साथ उसका संथथ आनेते 'सो चेव खर्‌ । 
णाण' एेसा कहना पडेगा, क्योकि परिहार शब्द पु्छिगी है. अथवा कर्तन्य क्या चीज दै, यकर्तैव्य कोनसी वस्तु दै 
इसका जव ज्ञान दौ जाता ई तव अकरमव्य-मिथ्यादशन, जान; अ्सेयम, कषाय, शौर योग इनका परित्याग होना 
उसको चासि कते दै सा माननेसे जो परिदरण सामान्य चासति दै वदी हान, चाख्रि एक दी दै दे.अतः चाखि- 
राघनारमे दी भेद वादीको अभिमत-मान्य एसा जो आराधनाका प्रकार टै बह अन्तर्तीन दो जाता है. इस ॒वास्ते 
चारित्राराधना एक ही हे एेसा चार्थं समह्ञना चादिये, 








72277 ध 2 
प 


11 


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८ ३९ 
[0 यः 


प 


न्न्य 


आधा 


गखातश्ना 


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चारित्रायधनायाम॑तभष्ो शानदक्षनाराधनयोरेव निगदितो न तपस आसधनाया इत्यत आद-- 
चरणन्मि तम्मि जो उज्मो य आउजणा य जो होई ॥ 
सो चेव जिणे्हि तवो भणिदो असं चरतस्स ॥ १० ॥ 
विजयोदया-चरणम्मि चास्ति ! तम्मि पतास्मिन्‌ । मकर्तव्यपरिद्रणे । जो य उञ्जमो उद्योग. 1 जाउजष्ना य उपयोग | 
जिणेर्दिं तवो दोदित्ति भाणदो दति पदघटना । चरणो योगोययोगावेव तपो भवतीति जिने कृतकर्मारिपसाजयै ख्कमिति 
1 


¶ [9 4. 


ठ ध व्याव्णितयिकट 
या आराधना तस्या चेष्टा कर्तव्येत्येतदाख्यानायोत्तरसूत्राणि, तथा चोपसदार. ' कादव्वा खु तदत्थं आददिद्ग 
वेसिणा चेद्वा * इति ॥ 


॥ १ [) 
1 
५0. = न... १ > 8 + ०-८-21 

ण्ट 

[4/५ 





माश्वासः 
१ 


1 
५ 
4 
५ (4 
१ 

0 











चासि तपसोऽन्तभोवो भान्यते । 

मूलारा---उन्जमो उद्यमः । आऽजणा उपयोगः अजुषठानमित्यथैः । सो चेव अर्प प्राकृते वचनादिन्यत्य- 
यस्य चहुं दक्ष॑नात्‌ । सो इत्यनेन उदयमायोजने परामृष्येते । तेन ते एव चरणो्योगोपयोगविनत्यम 1 असदं असणं । 
चर॑तस्स भ्रवश्रमानस्य मायादीनमलुष्ठानं छुर्बत. इत्यथैः | त्यक्तसुख एव हि चारित्र प्रयतते इति । तदुमस्ताव द्रां 


॥‰: || ठपो भवति तदारंभे परिकरत्वात्‌ । चारित्रपरिणामोऽन्तरंगं तपो भवति । प्रायश्चि्तादीना दुष्कृतिनिराकृतिपरत्वेन 
॥| 9 | तद्न्यविरेकात्‌ 1 भआया- 


व्यक्तघुखोऽनशनादिभिसत्सष्टते चत्त इत्यं क्षिपति ॥ 
म्राय्चित्तादीत्यपि चरणेन्तभैवति तप उभयम्‌ ॥ 
छृतसुखपरिदारो वाष्टते यश्चसत्र 

न सुखनिरतचिनत्तस्तेन वाद्य तपः स्यात्‌ ॥ 

परिकर इद्‌ दतोपक्रमेणान पापं 

क्षिपत इति तदेवेत्यस्ि वपे तपोऽन्त* ॥ 


वृत्तं वा-- 


चारिताराधनामे कान्‌ आश दर्शनका दी अन्तभाव आपने दिखाया है तपका नदीं दिखाया इस चैकाका 


९ 
2 |॥ उत्तर आचार्य आगे की गाथम देते 


अर्थ- चारित्रे जो उद्योग ओर उपयोग. िया_ जाता दे जिद मगवान्‌ उसकोदी तप्‌ कृते द. यद 
तंप्‌ आराधना जिसने मायाका व्याग किया ह उ्तको दोती है, अथौत्‌ माया-कपटाचरणका स्याम कर चासनम 
उचोग करना तथा उसमे उपयोग लगाना यदी तप दै. ेसा इस गाथाका भावार्थ है. 


विदेपार्थ--अकतैव्य अथीत्‌ मिथ्यात्वादिकका त्याग करनेमं जो प्रयत्न करना उसको यां उद्योग कहते 





18|| ३, जिसने सुखासाक्िको छोडा ई बह दी चारिवरम श्रवत करता दै, एेसे पयतनीठ शनिराजको बाद तप चाखि- 


भारभ करे सिथि सहायमरदान करता दै, अथीत्‌ अनद्चनादि वाद्य तप॒ चारित्रका सहकारी परिकर द . इस बाह्य 
तपे पालनेसे युनिव्यकी सव प्रकारकी सुखासाक्ते नष्ट होती दै. यदी अभिप्राय “ वादहिरतवेण होदि खु सव्वा 


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सुहसीठदा परचित्ता ” इस गाथा प्रस्पणमें आचार्य महाशय आगे कदेगे. स्वाध्याय ओर शरुतमावनाके जो पांच 

है उमे जो हमेशा परिणति करता है वह चारित्रमे परिणत हो जाता दै. शरुतमावनाकेः भ्रमावसे आत्माका ज्ञान, 
दीन, तप॒ ओर संयम ये पक्ायस्थाको शरासन कर ठेते दै. “ सुद भावणाए णाणं दंसण तव सजमं च परिणमदि ' इस 
गाथाम श्रतभावनाकी महती आचा्थं आगे करेगे. ज्ञान, दीन, तप आम परिणति होनादी उपयोग है. चारिबा- 
चरण करते समय ओ अतिचार होते ई उसकी पशात्तापपू्ैक निंदा करना यह आलोचना दै, आलोचनामं 
अकवयोका परिहार करे आत्माका उपयोग रता दै अतएव देसे उयोगको चारि कहना अयोग्य नदीं दै, 
जव ्ुनिको चासि पाते समय दोप गते द तव मन वचन योगसे भने हा ! दुष्ट काय फिया कराया व करन 
वालोको अनुमोदन दिथा, यह अयोग्य किया एसा उनके आतमाका परिणाम हो जाता रै. ओर उस समय बे 
अतिचारे पराक््ख होते द अतः एसे आत्मपरिणामोतो परतिक्रमण कहते दै, आलोचना घर प्रतिक्रमण इन 
दोनोके मेरुको उभय कहते र, अतिचाश्को कारणीभूव एेसे द्रव्य, क्षेत्र ओर कालादिकसे मनसे प्रथक्‌ रहना अथात्‌ 
दोपोत्पादक द्रव्यादिकोका मनसे थनादर करना यह्‌ विवेक दै. यह भी आत्माका परिणामदी दै. जिसका त्याग 
करना कठिन दै रेते शरीरसे ममत्व दूर करना अर्थीत्‌ यद शरीर मेर नदीं हे ओर न य शरीररका स्वामी दं एसी जो 
भावना उसको ब्युत्सर्गं कहते दै. अथौत्‌ परि्रहत्यागके प्रति ज उपयोग दै उसको व्युत्सगं कते है. यह 
मतिक्रमणादिरूम परिणाम चासत्र्प दै. अनशनाद्कि तप॒ चाखिके परिकर दै रसा 
उपर कहा है, अतिचारसदित वालि अचाखिरि रै रेखा बुद्धीसे निधित कर आत्मामे 
चासतिरिकी वृद्धि करना, वदना कना, खदे दोना इत्यादे क्रियाम असंयमका परिहार करके प्रदत्त रोना यह सव 
चारिका परिकर दै, नित्त ठेना अर्थाद्‌ दीक्षा धारण करना यह भी चास्रोपयोय टै. विनयके.पाच.यकार ह 
्ञान विनय ओर दोन धिनय ये ज्ञान व दर्॑नके सहायक दै. ओर उनके ग्रति उपयोगसूपम होनेसे ज्ञान ओर 
दस्ैनसे ये अभिन्न दै. पांचो शंदियोफे स्प रसादिक विपथोका त्याग तथा रागद्धेपका ओर कपायोका ल्याग्‌ इनका 
चार्िराराधनामे अतम होता दै. अयोग्य यचन्‌ ओर सरीरकी अयोग्य बेशर्थका त्याग करना, जाना, बोलना, 
आहार लेना पदार्थोका रहण फरना इत्यादि कायोभें पापरहित प्रत्ति करना ये सब चारोपयोग रै, अतः इस चासि 
विनयक्रा चासत्रम अतीव होता दै, जो तपसे शरेष्ठ है रेते यनिजमे तथा तप्यामि आदर श्खना, विसीकी 


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आधिः 


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यह तप 
माराधनाका परिकर दै. तथा यह तप आराधना चारित्राराधनाका परिकर है. कपटका त्याग करके जो तप किया 
जाता दै वदी तय आराधना है. 
इस यकार चार गरकारकी, दोन प्रकारक, एक प्रकारकी आराधना कदी है, ये आराधनाके भेद अथवा | {4 
समग्र आराधना कारण के विना कहना योग्य नहीं ह, क्योकि पुरुप बुद्धिस विचार कर कार्यं करता दै तथा ¢ 
उसका प्रयोजन किसी कार्य करनेसे सिद्ध होता दीखेगा तो च९ उसको करनेके स्यि प्रयत करता हे, अथव 
मयोजन सिद्धे सिये उसके साधनोंका संग्रह प्रत्नसे करवा ई. प्रयोजन सिद्ध होनी सेमावना नदीं दीखनेपर ॥१६ 
वह कार्थं करनेसे ट जाता है. अतः यदह आराधना पुरुपको श्रवण कार्यम केसी उदक्त करेगी १ देसे प्रशनका |¢ 
उत्तर आचार्थ देते दै-- र 
किसी प्रकरी बाधा जिसमे नदीं है रेसा मोक्षका सुख प्न कर ठेना यह आत्माका इष्ट प्रयोजन | 4 
ई. उतके सिद्धिका उपाय यद आराधना ही ६. अतः इष आराधनाका गिवेचन निर्वाण सुखेच्छ भव्योका 


गूराराषना 
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र 1 ् [ब चे. 
सिणा चेद्ध ” देता उपसंहार करिया ह, कषान, दीन आर चाखि इन तीना कोन एुख्य ह रेसा रश्च किया जाने || 
पर आचाय चाखि की ख्यत दिखानेके लिये उत्तर गाथा कहते ६ रेसा कितनेक विहान कहते हँ परंतु यह 
उनफा कहना अयोग्य हे, 








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सन्येऽ्र व्याचक्षते क्ानद्रनचारिरेषु किं पधानमिति चोये चारिघधा चान्यख्यापनायोत्तरसूत्रमिति तदयुक्तम्‌ । { 
णाणस्स दसणस्स य सारो चरणं हवे जहाखादं ॥ 
चरणस्स तस्स सारो णिव्वाणमणुत्तरं भणियं ॥ १९ ॥ 





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-मूलारधना 


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इति गाथार्ष. ॥ 
चोक्त- 

॥ ५ चारि खल चमो धम्मो जो सो सम्मोचि णिदि ॥ =, 

मोदकस्रोदविहणो परिणामो अप्पणो य समो ॥ ” 

दति ॥ “मोदो दिविध दु्नमोदश्चारिषरमोदश्च 1 तत्र दुशंनमोदजन्य अश्चद्धान द्वकाकाक्षाविचिफित्सास्यदृणि 





१ खपुस्तके. यदघ्र च फट्मिति पाठः । २ खयपुस्तके हतरान्तमाव हति । 


। 

विजयोदया--* णाणस्स दसणस्स य सारो चरण जदारवादु ' त्युक्ते कनद्दीनाभ्यां भधानं चारित्र इति | 
प्रतीतेरपपत्ते. । धरयाणामपि कमौपायनिमित्ततास्तिचा न वा यदि नास्तीत्युच्यते सत्रवियेध _‹ सम्यग्ददनक्रान- | 
चारिघ्राणि मोक्षमागं 1 पति खूत्रमचस्थितम्‌ । अथोपायत्तास्ति ? पराथतया गणत्वं चरयाणामिति का श्रधानता | ; 


क्ञानदक्नयोरत्निशयितरूपं छ तन्मोदनीयजन्यकरुकरद्दित, चरण चारित्र 1 दवे भवेत्‌ । जदाखाद्‌ यथा- (0, 
॥ 
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परशासखासस्तवरूप । चारिघमोदजन्थौ रागद्वेषौ तदजुन्मिथ शान ददन च यथाख्यातचारितरमित्युच्यते ” दति सता । ( 
चरणस्स च्नारिघ्रस्य, तस्स तस्य, यथाख्याताख्यस्य । सारो अतिशयित फट साध्यसाघनलक्षणसवधनिमित्ता ष्ये | 
पष्ट तेन साध्यफट खन्ध, साराब्दस्तु तस्यातिशयमाचंे। ततोऽयम्थो जात यथास्यातचारित्रस्य फठमतिशयितमिति। शर 





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-गूलाराधना 
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करनेषर दर्जनको द्रोप सिवाय काव्यम ओर कोनसी वस्तु प्रप्त दोगी १ यहां सार शब्दका उककृ्ट युण एसा अर्थ 
किया दै, प्रकृत विपयभं भी वही अर्थं करना योग्य दै” 

मोहनीय कर्मसे उत्प हृए्‌ दोप जिसमे तिठमात्र भी नीं है एसा यथार्यात चासि दी ज्ञान ओर 
दददीनका क्कृष्ट स्वरूप दै. ह 

रागदरेपरहित जो आत्माकी समावस्था उसको चारित्र फते है, मोहका उद्य न होनेसे परिणामोमे जो 
निर्मलता पायी जाती है उसीको समावस्था कहते है. इय समावस्था को धै कते दै. इसीको दी चासि कहते 
ह, इस विषयमे ' वास्ति खट धम्मो ' यह गाथा प्रसिद्ध ह- र 

द्धन मोदनीय ओर चारित्र मोहनीय एसे मोहकर दो भेद है. उसमे दशनमोदके उदथसे जीवादि त्त्व" 
प्र अश्रद्वान उलन होता है, शके दका, कांक्षा, विचिकित्सा, अन्यद प्ररीसा, अन्यदशटिसस्तव एस उत्तर 
भेद है, चासि मोहे रागप होते है, इस दो प्रकारे मोहकमसे अलिप्त ठेस भद्धान ओर ज्ञान दी यथाख्यात 
चारित्र है. एसा * णाणस्स दंसणस्स य ' इस गाथाका अभिप्राय दे. । 

यथाख्यात चारितरिका अतिदाय एल नि्वीण दै, निवौण शाब्दका मिना एसा अर्थं दै, जसे-“निवाणः 
प्रदीपो न्ट शति थावत्‌ ” दीप निर्वाण हुवा, न्ट हुवा, यहां निर्ण शरब्दका सामान्य अथं नाश रेता है, तो 
मी प्रकृत विषयमे चारि्रिमे ज कर्मना फरनेका साम्यं ६ उसका प्रयोग यहां निबीण शब्दसे किया है. 
अथीत्‌ क्का नाशा करना यह चासतरिका फक है, कर्मका नाश दो प्रकारका रै, १ थोडे कर्मोका नाश २ स्व 
कर्मोका नाश. ‹ णिव्याणमण॒त्ं भणि्यं ' अथीत्‌ अनुत्तर शब्दका निर्वाण रशव्दसे संवध दनेसे सवै कमौका 
नाञ्च धी यहां अभिप्रेत-इट ६, यदी यथाख्यातका सर्वोत्कृष्ट फर है एेसा आगमम प्रतिपादन किया दै 

अथवा दुःखकी कारण एसी क्रियाओंका परिहार होना यह ज्ञान आर श्रद्धाका एल दै, जां फर रहता 
&, बहा उमा कारण भी रहता रै जसे घट कार्यं ह तो उसके साथही मही सूप कारण भी रहता दे. उसी 
तरद जहां चारित्ररूषी एल अथव दु खोके कार्णोका परिहार एतत्छरूपी फल है उस आत्मा चार्के दैतुरूम 
अथात्‌ एको उत्पन्न करनेवाले ज्ञान ओर भ्रद्धान भी रहतेदी है. अतः चाखत्राराधनार्मे ज्ञान अर दशनाशधनाका 
अंत्माव होता दै रसा सिद्ध हुवा, 


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जितनी पापयुक्त क्रियाय हँ वे सब दुःख उत्पन्न करती है इसका जव आत्मको क्ञान रो जाता है ब || 
भदान दो जाता दै तव आत्मा सी दुःख कारक कियार्थोका त्याग करता दै. परंतु ज्ञान ब श्द्रान न हे तो || 
ए करिया आत्मा विरक्त नदीं होता, रेसी किया उसको आद्‌ दोता है ब कस्याणकारक किया बर || 
अप्रीति रखता दै. जव्‌ क्ञान दैन युक्त चाखिििकी आत्मको प्रापि होती हे तव वह चासि नवीन कर्म॑ आत्मामे |||; 
नदीं जने देता व पूर्व बद्ध कर्मकी निर्जरा करता दै. अतः इस वारित्रका उत्कृष्ट फल कर्मक पूरणं विनादा करना 
दसा आचार्यका कहना योग्य दी है. 





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जायते ? एवमिति सि 3 ९ $ 

भ ९ खभवविरुद्धमाच रतीत्यपेकत्यते, न चेत्कथमुक्तमित्युच्यते । किंच तस्य॒ सूत्रस्य या पातनिका रुता ॥ #‰; 

+ रि ८ > ॥ 3 
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एणव्वाणमणुत्तर भाणिय ' शत्युक्त चारस्य समतारूपस्य फरमकशषपकमौपाय इत्युक्त ॥ 


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यज्कषा्यं॑तद्टुःखनिसकरणफटं यथा चष्ठु्ोनमित्यन्वयद्टान्तं प्रृते वुदायन्नाद- 
खारा -चकलुस्च टंसणस्स-चश्ु्ानस्य सारो फलं ! सप्पादिदोसपरिदरण । सपादीना अुजगशकीटकादीना 
व दुःखदः स्पदीनमक्षणादिक्रिया तस्य परिजनं । चक्खु चश्चुदवनं, भिरत्यं निप्फटं । विटे गवौदाुपपावदेतौ ॥ 


दुःखेकि कारणा द्र करना यह श्ञानका फल है इसका अन्वय सिद्ध करनेके सिये आचार्यं चंत 
कहते है 
„ दी अर्थ- नेत्र ओर उससे होनेवासा जो कर्य उसका फल सदं, कैटकरव्यथा इत्यादि दुःलोका परिदार 
करना यह है. प्रतं जो' विलादिक देखकर भी उसमे गिरता है उसका नेज्ञान व्यर्थ है. 
बिवेषाथ-यहां च्च श्दका अर्थं द्रन्यचक्. दसा दै. इत चक्के व ओर्‌ उपकरण एसे दो भेद ह 


यहां दूसरी व्याख्या एसी है. “ कान ओर द्नसे भी आत्माका अधिक + 
चाति दहै! "दसा गव गावे कदा द, प्रत यहां एसी दका उत्पन्न हवी है 

श्वान दष्ट मार्गं ोनसा ओर अनिष्ट मार्ग कोनसा दै यह दिखाता है, अतः वह उपकार करता £ ठेसा 
कहना योग्य दै, ” यह्‌ कहना योग्य नहीं ६. ज्ञानमात्रसे शट सिद्धि नदीं धती. कारण प्रदृत्तिरीन कान न्हीकि 
समान है, जेसे नेत्से श्वान दोकर भी वह यदि इवेमे गिरते इवे पुरूपको नरी चचाता है तो वहं व्यथं है. 


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या आचायं उपर्युक्त व्यार्याकारको प्रश्र करते है- 

५0 ५५ ह्ञान ओर दुद्रीनसे भी चाखिका आत्माके उपर आधिक उपकार दै ” एसा केष गाथाम कहां ६ ? 
(५ पं गायाम फा ६ देता आप कहते ई परन्तु यद आपका कना मिथ्या दै. ॥ ध 
9; ^ णाणस्स दसणस्स य सारो चरणं हवे जहाखाद › इस वाक्यसे ञान ओर दृनसे भी चासि्िदी उपकारी 


भाक्वाषः 


| ठ दैेसा जो यी आपने किला दवद भी जप पु नसते विरद है 








१6 कर्मापायो दि कथ पुरुषार्थ. दु.खनिन्रचिः सुख चाभिमतं फलमित्यारेकायां प्रधानपुरुषाथस्य भसिटवाधा- || 
| व्वपरामरूपस्य खलस्य निवंधनतयोपयोगितामाचष्टे कमोपप्यस्य-- 
( णिव्वाणस्स य सारो अव्वाबाहं सुहं अणोवमियं ॥ 


४ दु.खापाय. क कायर अनुत्पत्ते, । अणोवमियं उपमातीत । काद्व्वा ( 1 व चेष्टा । तदह ॥ 
|| सव्यावाधटखाथंम्‌ । मादद्गेसिणा आसत खगयत्ता । कछ चेष्टा कायौ ? साराधनाया श्रुतावनतिचारछानदशेन || 
- ¢ चारिप्रपरिणतिरूपाया । कस्मात्‌ ? ( 
४ 

निवाणफठमाद- १ 
{८4 मूढारा--अव्वावां निटु-खं दुः खदेतूनामशेपकरमणा क्षयात्‌ । तत॒ णव अणोवमियं अनस्य । स्वगोदि || || ५८ 
{६ || सुखाना कमांधीनतया  सन्यावाधत्वात्‌, । तदं मन्यावाधसुसार्थै । आददिक्गवेसिा आत्महितान्वेपिणा । चेदा ||| 

| अनुष्ठानं । प्रकृतत्वान्मरण ज्ञानद्दीनचारि्तयःपरिणतिरूयायामाराधनायाभिति योज्यं । र 

९९ 2९ 




















|¢ ४, प { 

(@ | होना यह फ दै रेसा पूर्व गाथाम कदा दै, परंतु केका नाश होना यह्‌ पु्पारथ कैसा १ टुःखका 
| 4 [५ [+ 

(| दै रेसा विवेचन ग्रंथकार करते दै-- 

| 4 


(8 नाश दोना यद योग्य ही है. अतः यह दुःखामाव अथा सुख अदुपम ह उपमारहित ह. आस्मदितव् 
| | करनेवाले ष जनको मरण समयमे ज्ञान दरदीन जर चाखि्मे निरतिचार परिणति करना चाहिये. क्योकि, 





{| यस्तत्‌ 


+ चरणस्व तस्स सासे णिव्वाणमणुतचतरं भणियं ' इस सत्रसे समतारूप चारित्रका संपूण स नाश्व 
नाश 

|; इट खुलकी प्राति होना यही फर मानना योग्य दै, देसी शंकाका आचारय इस प्रकार उत्त देते ईद-जिसमे विलमात् 

|| भी बाधा नदी है रसे पुरुपा्थं रूपी सुखकी आपि दोनेमे सर्व कर्मैका ना दोना यद कारण दै अतः वह उपयोगी 

|; दी अर्थ-कर्मसे रतन हए समल दःोका अमाव होना यह्‌ संपूर्ण कर्मके नाशका फल दै. कर्मद सर्व 

|| दुःसोका जनक द अतः जब कैका पूण य होता है तव दुःखका केश भी नहीं रता है. कारणक १ 








ज्या चस्तिसारो भणिया आराहणा पवयणम्मि ॥ 
सव्वस्स पवयणस्स य सारो आराहणा तद्या ॥ १४ ॥ 


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त अन्य स्याख्या--यदिदसुक्तं फं पतय्वारिजिमा्राटुत विरिटाज्जप्यते इत्याद-जघ्या चरित्तसासे एति । 
किं पातनिकार्थो गाथाया सबादसुपयाति न चेतीत्यज्न श्चोतार. प्रमाण । कस्मात्‌ ? अतिशयवच्याराघनागमेऽभिदिता 


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 भरराराघना \॥ मूखारा-चरित्तसारो चरित्रस्य जीवदवस्थामाविनिरतिचाररत्नत्रयप्रयतनस्य सारः फठं | आरादणा मरणे 
६० » || निरतिचाररल्नत्रयपरिणतिः । पवय्रणम्मि प्रकर्येग टद्ृट्टप्रमाणाविंरोयेन उच्यत प्रतिपाद्यन्ते जीवादयो भावा अनेन 
¢| अस्मिन्वेति प्रवचनं जिनागमस्तास्मिन्‌ । सारोऽतिद्लय. । आरादणा आराधनेव च श्व्द्स्य एवकारार्थस्यात्र संवधनात्‌॥ 








दी अर्थ--ग्रलयक्ष व परो माणक अदुसार जीवादिक पथार्थोका जिसने अथवा जिसमे विवेचन 
| किया हे एसे जिनागमर्ं ज्ञान, दुन ओर पार्पोका परिहार सूपी चा इन तीरम . जो पूणं उद्यमरील हवा दै 
उसको आराधना सूप एल प्रप्र होता है. अतः संपूर्णं जिनागमनका यराधनाद्ी सार दै अथाद्‌ सर्बेत्कृष्ट एल हे. 

| _~ यां दुसरी व्याख्या एत दै-उपरकी माथा जो एर कदा दे चद चासत्रमात्रसे मिलता दै या 
| विशिष्ट चास १ उत्तर बिविष्ट चाखिते भिरता ईै- 

| जम्डा चरिचसारो दस घृनरफे उपर जो पक आपने लिखा दै उसका अभिप्राय गाधाके अमिप्रायसे मि- 
| रुवा जुकता टै या नहीं इसम्‌ हम ओता दी यमाण समदते द. क्योकि आगमे आराधना सर्वोत्कृष्ट फलस्य 
| दै ्साकहारै. 









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सुचिरमवि णिरदिचारं विहस्त णाणदंसणचरित्ते ॥ 
मरणे विराधयित्ता अणतसंसारिओ दिह ॥ १५ ॥ 


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7.41 ॥ न~, ~ ^_^ > ध < 

1 || वन ऽसयमे परिणतो भूत्वा । अणतससारिओ अनतमवपर्यायपरिवतेने उद्यत । द्धो दण्ट । देशोनं पृवक्षोरीकालं 
:॥ अनतिचारर्नघ्रयथवृच्तानामपि तत भ्रच्युतनां सक्त्यभाव सखखारे चिरपरिश्रमणकथनन्याजन दर्धयति 

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कस्माद्तिश्चयवत्तया मरण आराधनागमेऽभिषदितवि चेत्‌ यस्मात्‌-- व 

मृटारा-सुचिरमवि अष्टवर्पोनपू्ैकोटिकाठमपि । विदरित्ता परिणतो भूत्वा मरण मवपयौयविनासे वतेमान 
इति शेपः । विरादायित्ता-रत्ल्यपरिणतिं विनाङ्य भिण्याज्ञानासंयमेु परिणतो भूव्ेत्यथै. । अनैतसंसारिओ अनतभव्‌ 
पर्यायपरिवतने उद्यतः ॥ ४ 








ददी अर्थ-चिरकारुपर्यत भी ्ञान दशन ओर चासितिमे निरतिचार परद्त्ति कर॒ मनुप्यसव्‌ छोटक 
समयसे यदि रललत्रय परिणामे यह जीव भ्रट दोगा अर्थात्‌ रत्नयपरिणारमोका नाश कर्‌ मिथ्याद्दीन, ज्ञान 
भौर असंयम परिणत दोगा तो अर्नतससार युक्त टो जाता दै अथीत्‌ अनंतभवके पर्याय धारण. करनेवाला 
होता है. जिन्दने देशोन पूर्वं कोटिकार पर्येत निरतिचार रलत्रयका पारन किया प्रतु मरणसमये वे उससे 
भ्र होगये तो उनको क्तिका अभाव होता है यह ससार चिरकार परिभ्रमणकरे कथनके निमित्तसे आचार्यने 
दिखाया है, 








अदुपगतमिध्यात्वस्य सचिचकितचारितरस्यापि परीपदपरिभवादुपगतसङ्केशस्य मदती सङतिरिति भयोप- ¦ 


दर्नेन सङ्करा परित्याज्य ति निगदति सूत्रकार. । 
समिदीसु य गुत्तीु य दसणणाणे य णिरदिचाराणं ॥ 
आसादणबहुटाणे उकस्सं अंतरं हों ॥ १६ ॥ - 
अमितगतिभरा- समित्तियु्षिसकज्ञानददयनादिच्येरिनाम्‌ ॥ 
प्रवतिंततापवादानां जायते मददतरम्‌ ॥ १९.॥ 
विजयोदया-समिदीखु य इत्यादिना अन्ये व्याचक्षते-“ उक्तस्यानतससरारस्य प्रमाणग्रतिपादनाय आयाता गाथा, 
अनतस्यानतविकःपत्वात्‌ अनतविदेपः प्रतिपादनीयः » अस्या ग्याख्याया उक्छस्स अतर दोदरी त्येतावदु पयुज्यते । इतरस्य 
वचनसदभैस्य अन्कत्व प्रसज्यते इति । समिदीखु य सम्यगयनादिषु अयन समितिः, सम्यक्‌श्च तक्षाननिरूपितक्रमेण 
गमनादिषु - वृत्ति समितिः । सावद्ययोगेभ्य सात्मनो गोपन ग्नि, । वस्तुयाधात्म्यश्रद्धान ददन । अयेतमिथ्या- 


प स 





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त्वकटकस्यात्मनो चस्तुत्त्यपरिक्ाने मत्यादिक्षयोपलणभिकं पानं । क्षायिके सति पनि आसदद्नाया असमवः 1 
मोदजन्यत्वात्सङ्केशस्य, मोदस्य च केचखक्षानोन्पत्ते भगव विनष्टत्वात्‌ ।! तया चोक्--' मोदक्षयार्सानददनावरणा- 
न्तरायक्चयाद्य केवटम्‌ * ति । वीतरागसम्यक्त्व च नेद दीतम्‌ । मोदयटथमन्तरेण वीतरागता नास्तीति 1 
दरयासभितेरतिचार. मेदालोकगमन, पद्चिन्यासदेशास्य सखम्यगनाखोचनम्‌ , अन्यगतचिच्ादिकम्‌ । इद वचन मम 
गदितं युक्तं न वेत्ति अनारोच्य भापणे, अक्तात्वा चा । अत एवोक्तं ‹ अपुष्ट दु ण नसे भासमाणस्स तरे ' ति 
अपृ श्रंतधमेतया सुनि अपृ इत्युच्यते । भापासमितिक्रमानभिशते मेन रृदीपत्‌ शत्य. । पवमादिको भापास- 
भित्यतिचार. । उद्रमादिदोदे खृदीत भोजनमनुननन वचसा, फयिन वा परस्ता, ते सदवाख, प्िथासु पवर्तन चा 
पपणासमितेरतीचारः 1 ादातव्यस्य, स्याप्यस्य वा अनाखोचने, फिमनचर जतव सन्ति न सति वेति दु प्रमान 
च आदाननिक्षेपणसमित्यतिचार । कायभूम्पद्येधने, मटसंपातदेलानिरूपणादि, पवनसन्विशदिनकसादिपूक्मेण वृत्ति 
प्रतिषएपनासमित्यतिचारः ॥ असमादितधित्ततया न 

सचरणदेवे, _ अघ्युभध्यानाभिनिविष्स्य वा निष्ठता । अआघ्तामासव्रतिर्विवामिमुप्रतया वा तदाराधनाव्यापृत इवाच- 
स्यानं । सचिन्तथूमौ सेपतत्छु समततः येषु मदति वा चात दस्ति, योषदा दरपातव्णा अवसानं निश्चला 


8 गा तं ुतातिचारः । अ्लर्पदादीना न्यूनताक्ररण, मतिच्रद्धिकरणं, विपसत- 
पोवापर्यर्चनाचिपरीताथनिरूपणा ब्रथाथयोवंपरीत्य समी सानातिचासाः । उक्तातिचारयिगमो निरतिचास्ता चारि 
घ्ादीनाम्‌. । मरणकाे रत्रत्रयपरिणामामावि दोप उक्तः ॥ 





गावाया" संवादगाथेयमिति जयनंदिपाद्‌ा. 1 समिदीसु -सम्यर्‌्रतनिरूपिवकरमेण गमनादिप्मयनमिति भयृत्ति समिति. । 
-------------------------------------------------------- 


१ ख पुस्तके अुषटशरुतधर्मतया सुनिरपुष्ट एति पाट. 


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फायक्रियानिचृत्ति- कायराप्तेरति चारः । पएकपादादिस्थानं चा जन- 











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विदेप- यहां कोद आचार्यं उप्त: गाधा्मे, “ अनंतससारिभो रोदि फसा शब्द आया दे उसका 
खुलासा करनेके लिये यह माथा है सा क्ते ई , अनतसंख्याके अनैव विकल्प होते द अतः 
उपयुक्त अनैत ससारका प्रमाण दिखानिके लिये यह गाथा द्‌ ६ व क्‌ आच्या थन ६ दै परन्तु यह अयुक्त 
द्र यदि इतना दी अभिग्राय होता सो ' उक्कस्सं अतरं होदि ' इतना दी वाक्य उपयुक्त ह एसा सम्चकर 
गाधाके तीत चरण व्यथे है एसा मानना पदेगा, अत. पूर्वं गाथाका सय्टीकएण आर्‌ सत्यताकृ समथन करने 


| स्यि यद गाथा है अथीत्‌ सकले परिणाम रखनेका फल दिखानेका उदे इस गाथाम ग्र॑थकतीने लिखा है ण्या 


समञ्चना चादिये, 

गमन, भाण, आहार्‌ बस्तु रसना! उटा लेना, मलमूत्रादिक क्षेपण करना एसे कार्यम धतज्ञानमे- 
आगमम जसी प्रवृत्ति करनेका चणन्‌ कयि ३ वेसीहि अवृत्ति रखना उसको समिति कहत दै. अथात्‌ प्राणे 
दसा न हो, उनका संरक्षण हो इ तरहसे प्बति करना वह्‌ समिति द. 


रहा है ओर अपनेको प्रकरण, विप्य मादस नह 8 है तो वीम बोलना अयोग्य है, जिसने रं स्वस्य सुना 














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महीं अथवा र्मवरूपका जिसको पूर्णतया ज्ञान नदीं है एसे शनिको अपुष्ट कहते द, मापासमितिका क्रम जो 


उसकी प्रद॑सा करना, एसे आदारकी प्रशसा करनेवालोके साथ रहना, प्रद्ंसादि का्थमे दुसरोकों श्रघृत्त करना, 
आदाननिक्षेपणसामितीके अतिचार-जो चीज लेनी दै अथवा रखनी ह वद रेते समय अथवा रखते समय 
समे जीव दै या नदीं इसका खयाल-ध्यान नदीं रखना, तथा अच्छी तरहरे जमीन वे वस्तु स्वच्छ न करना, 
्वि्ठायन समितीके अतिचार-दरीर व जमीन पिच्छिकासे न पोना, मलमूतरादिक जहां कैपण करना है 
वह्‌ स्थान न देखना, 
मनकी एकाग्रता विना शरीरकी चेष्टाये बद करना काय गुशतिका अतिचार है, जदं लोक मण करते ह 
देसे स्थानम एक पाव उप्र कर खहे रहना, एक हाथ उपर कर्‌ खटे रहना, मनम अद्यम्‌ संकरप कसते हुए अनिशर 


कायोत्सगके दोपे न र्यागना ये भी कायगु्रीके अतिचार दै, रागादविकार सहित स्वाध्यायमें ्रृत् रोना, 
मनोगुङ्गिके अतिचार द. ५ 
रका, कांधा, पीचेकित्सा, अन्य दष्ट यदय॑सा, संस्तव ये पांच सम्यग्द्नके अतिचार है, 

कासा आगे आचाय करेगे, क 
द्रव्य शद्भि काल युद्धि, भाव शद्वि, क्षत्र शुद्धि इन शद्धिओके विना शासका पठन करना यह य॒ताति- 
चार दै, अक्षर, शब्द्‌, वाक्य, चरण इत्यादिको कृम करना, बढाना, पीेका दर्भ आगे लाना, आका पीट 
करना, विपरीत अर्थका निरूपण करना, रथ व अर्थं विपरीतता करना ये सव ज्ञानातिचार दै. संदेद, विपर्यय, 
ये न भत ६ उवयुक्त अतिचारोपे समितियुप्त्यादिक रहित दोनेसे  चारादिषोम 


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इदानीमाराधनाफटातिद्ायख्यापनायाद- 
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दिद्धा अणादिमिच्छादिद्टी जद्या खणेण सिद्ध य ॥ 
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आराहया चरस्तिस्स तेण आराहणा सारो ॥ १७ ॥ 
व्वारि्राराधने सिद्धाधिरमिथ्यात्वभाविताः ॥ 
क्षणादृषटा यत्तः सूत्र चारिचाराधना ततः ॥ २० ॥ 
विजयोदया--दिद्ध इत्यादिक 1 एदा रए उपखन्धाः । अणादिमिच्छादिद्धी अन्‌ादिमिथ्यादण्टय्‌ः । भरणादयो 
राजञपुत्रास्तसिन्नेव मवे खतामापप्नाः यत पवानादिमिश्याद्टयः भ्रथमजिनपादमृे श्वतघभसाराः समायोपितरत्नघ्रया, । 
जद्या यस्मातक्षणेन क्षणग्रदण काठस्यास्पत्वोपलक्षणार्थम्‌ अन्यथा क्षणस्याल्पकालतया क्मंशातनस्य फयुमद्क्यत्वात्‌ 
सकलकमेशगतनपुरस्सरं क्िद्धत्वमेव न स्यात्‌ । सिद्धा य सिद्धाघ्य परिपराघत्कापक्षानादिखभावाः, चशब्देन निरस्तद्रव्य 
भावकमैस्रदतयश्च, टा आराधनासपादकाः\ च रित्तस्स चारिस्य । चारितरग्रहण रत्नघ्रयोपखक्षणं । एतेन चारिघ्ाराधनां 
स्तौति शत्येतद्ध्ास्यानं निरस्तं । चारिज्राराधनास्तवनस्य नायं प्रस्ताव. ! आायुरंते रत्नन्रयपरिणतिरिद भक्राता 
स्तोतु, किमुच्यते चारिघधाराधना स्तौतीति । 


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एवं मरणसमये रल्च्रयविराधनाया दोषं भकाद्यदानीं ददाराधनाया, फडातिशय प्रकाशयवि- 

मूडारा-जणादकनिच्छादटरी अनादिकाटं मिथ्यात्वोदयोद्रेकाज्ञित्यनियोदपयोयमलुभूय भरतचाकरिणः पुत्रा भूत्वा भद्रवि- 
बद्धेनादयक्षयोर्विंशत्यधिकनवरातसंस्याः पुरुदेवपादमृजे शरुतथभसाराः समासोपित्तरत्नत्रयाः खणेण अत्पकाठेनैव सिद्धा य 
सिद्धा" संप्ा्ानंवज्ञानादिसवभावाश्चकव्दान्निरस्तद्रव्यभाव कमस द्तयश्च । चरित्तस्स रत्नच्रयस्य । वेण तेन कारणेन 


सारादणा आयुरन्ते रतनत्रयपरिणत्तिः । सारो सवौचरणाना परमाचरणम्‌ । 


मरणकारम रतनत्रयपरिणति न दोनेसे दीर्ैकारपर्यैत संसारभ्रमण करना पडता है इस दोपका वर्णन 
किया, अन आराधनाके एलका मादारम्य कदनेके सिय अथकार कहते दै-- 





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षी सर्थ--चाखिकी आराधना करनेवारे अनादि मिथ्याच्छी जीव मी अरपृकार्म संपूर्णं कर्मोका नाश्च 
कृरक क्त हो गये सा देखा गया दै, अतः जीवोको आराधनाका अपूर्वं फर मिलता ह, एसा समन्ना चादिये. 

भावार्थ--अनादिकाठसे भिथ्यात्वका तीव्र उदय होनेसे अनादिकार पयत जिन्दोने निरय निगोदयया- 
यका अलुमव हिया था रसे नरे तेवीस जीव निभोदपर्याय छोडकर भरत चक्रवाके मद्रविवर्थनादि नाम धारक 
पुत्र उत्यस्र हए थे, उनको आदिभगवानके समनसरणमं ढादशंग वाणीका सार सुननेसे वैराग्य होगया, ये राजपुत्र 
सदी भम ्रसपययिको प्राप हुये य, इन्दोनं निनदीक्षा केकर रलत्रयाराधनासे अपकारम्‌ दी मोक्ष ठाम 
करिया, अर्थात्‌ भरणसमयमें इन्दोने रतनच्यकी विराधना नदीं फी इसरिये उनको आराधनाका उत्कृष्ट फएल-मोक्ष 
मापन हवा. एसे अनादि मिथ्यादष्टिओका मी रलनत्रयसे सर्व कम नट होता है च॒ अरत ज्ञानादियुणरूप सिद्ध 
श्राप होवा रै, 

मायामे ' चास्तिस्स य आराहया " यद्‌ शब्द्‌ दै. चाखरिका अर्थं यद्यं रतनव्रय एसा समन्रना 
चाहिये, अतः  चाखराराधनाकी स्तुति करते द ' देसा फोड़ व्याख्यान करते है उनका खंडन दो गया, ्योकि 
यां चारिराराधनाका महत्व बतानेका प्रसंम नदीं ह. आयुके अंतमे ररनत्रय प्रिणामकी विराधना नदी कना 
चादिये यह अभिराय इस गाथाम कदा है. अतः ' चारित्राराधनाकी स्तति करते है ' एेसा व्याख्यान करना योग्य 
नहीं है, 

^ सप्वस्स प्रवयणस्स य सारो आराद्रणा तद्या ` इति यदुच्वते, यस्िक्नेव काले मरण तस्िघ्नेव काटे 


रलघ्नरयपरिणतेन भाव्य दिताधिना अन्यदा किमिति चारि तपसि च प्रयास, क्रियते दति रिप्यदकासुपत्यस्यत्ति 
सूत्रकारः-- 





जदि पवयणस्स सारी मरणे आराहणा हवदि दि ॥ 
फं दा सेसकारे जदि जददि तवे चरितति य ॥ १८ ॥ 
स्रतावाराधनासारो यदि प्रवचने मतः \ 

किमिदानीं सदा यत्नश्चतुरंगे विधीयते ॥ 





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हिदी अर्थ--आगमका सारसी रतनत्रयपरिणति मरण काठ यदि हती हुई देखी जाती है तो मरणकारसे 
भिन्न कारे अथीत्‌ दीक्षा रहण, रिका ग्रहण, गण पोपण, आतम संस्कार इत्यादि काभ चारि ओर तपरणे यत्न 
कृरलेकी क्या आवश्यकता है १ अथौद्‌ अनदनादिक तप, सामापिकादिक चारित्र ओर सम्य्ञान, सम्यग्ददौन 
इनमे अदृत्ति करना व्यथे है, दीक्षा, रिक्षा वगैरे कारम रलत्रयकी आराधना करे पर ॒भी मरणकार्मे थदि 
रलतरयकी आराधना न दौ तो सिद्धिमाषि नदी होती है, ओर यदि अन्यकालममे रत्त्रेयमावना नी की ओ 
मरणकाले रलव्रयाराधनासे मोक प्राप हो गया तो मरणकारीन रत्य मोक्षका कारण दै पूसा सिद्ध होता 
ह, अतः ेपकाटमें रलव्रयाराथना करना निष्पद है, भ्रयास मात्रही है. 

इस दकाका उत्तर--मरणसमयमे रत्न्यकी विराधना करलेसे पिराधकको दीथै कार्तक संसा 
अरमण करना पठता है, परंतु दीक्षादि काले विराधना हेग हो तो भी मरण कारम र्तत्रयकी ्रप्नि दो जानेसे 
संसारका नादा हो जावा है अतः मरणकालमें रसनव्रयमे परिणति करनी चाहिये ठेसा हमारा अभिप्राय है, इतर 
कारम रलन्रयाराधना की तो वह विफर नह होती द, उसे कका संवर ओर निजश होती है, तथा घाति 
क्का क्षय करनेमे वद निमिच होगी रसा हम समक्षे है. “ सम्य्दिश्रावकविरतानतव्रियोजकदरनमोह 
्षपकोपदांतमोदक्षपकक्षीणमोहनिना; ऋमदोऽपख्येययुणनिर्जराः » सम्य्टष्ट, श्रावक, विरत इल्यादिक्‌ 
वय्तर्थोको सम्यगद्नादि गुणो उत्तरोचर असख्यात गुण स्यसे निर्जरा रोती है ेसा दत्रकार उमाखाम्याचायं 
कहते है, अतः दीक्षा रिक्षादि कारमं रलव्रयाराधना व्यथ नदीं ६. क्षायिक सम्यग्दशेन, ज्ञान चारि यह सव 
साध्य इतर काठीनभावनासे भी प्राप्त होते है अतः व्यथ नीं है, अतः तुस्दारे प्रक्रफे असुसार भी चकाका 
परिहार करना शक्य दै, यदी बात आगेके गाथाम्‌ दिखते है-- 








क्षायिकं सम्यक्त्व क्षान चारि च यत्ताध्य तदसिटमवाप्यत एव इतरकालबृच्यापि भावनया । तदेव चोचं 
चोद्यते एति चेतस्सि छृत्वा सूस्श्ोयासारेणापि परिदरत शक्यते इत्याचष्टे ॥ 
आराहणाए कजे परियम्म सन्वदा वि कायव्वं ॥ 
पाेयम्मभाविदस्स ह उ॒दसज््ाराहणा होड ॥ १९ ॥ 


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9 || तोऽथ नियोग वीप खु क भावितस्येव खु शब्दोऽवधारपाथै, ! श्ुसग्धा दोदि 





४: खेन शेकमतेरण साध्या भवति 1 फा आराधणा जाराधना तिगोचसा ॥ 











|| - ददी अथ-म्रणसमयमे रलत्रयकी सिद्धे षयि सम्यग्द्नादि प कारणकरापकी अवद्य प्ति कर सेना 
{| चादि. अथात्‌ दीक्षा; शिक्षा, गणपोपण, आत्मस्कार, सछेखना इत्यादिकाठ्मे सम्यग्ददीनादिककी परा कर 


|| लेना क्न्य है, जिसने त सम्मदरीनादिवो ी अच्छी मावना-अभ्यास पी दै उसो मरणसमयमे 








6; टि तेन परिकरो 
|, _ येन व ध इत्यु सथ एातवलेन साधयितुसुचरखव्रम्‌ । तथा च वदेति 
' | जह्‌ रायक्रुखपर्ओ जोम्गं णिचमवि कुणद्‌ परिकम्मं ॥ 
तो जिदकरणो जुद्धे कभ्मसमत्थो भविस्सदि टि ॥ २० 





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| समत्थो भविस्सदि समर्थो भविष्यामीति ॥ यो यत्साधयितुं धाति स मि ध यतते, यथा सिपूतिन्ुकाों 
हननकर्मोपायं अस्रिष्षा करोति लाप गाथया दधित । 
कोऽत्र दृष्टान्त इति चेदुच्यते- 
मूडास--जोगग, युद्धयोग्यं । णिच्चमवि युद्धकाखात्माक्‌ प्रतिदिवसमपि । परियस्म शक्ञादयभ्यासं । तो 
| पञ्चात्‌ । जिद्करणो स्ववरीकृवक्रियः सन्‌ । कस्मसमत्थो न्यधनादिकार्य॑घ्मः ।मविस्सति अद भविष्यामीति मत्वा । 





जिस पुरुपको जो कायं सिद्ध करना है व वदे उसके कारण कलापक संग्रह कर इस अर्थको दंत बरसे 
सिद्ध करमेके सिये अगेका स्र टै. चादी परतिवादीके विवादसमयमे मे शतके दवारा साध्यकी पिद्वि होती दै, इष 
न्यायसे प्रस्तुत आराधनाफी सिद्धिके सिये धाचार्य द्एातप्रद्न करते है 

हिंदी अर्थ-- जैसा राजपुत्र शस्रवरि्याके साधनभूत करारणसामग्रीका नित्य अभ्यास करता हे अथात्‌ धके 
पू्वकरालमे द्ररोज शसक सूभ्यास क्ता दै, उसफे यभावसे बह शसरविधम पूरणं स्वाधीनक्रिय शता दे 
अथात्‌ -निरुण होता दै जिसे युद्धम र््यसेद, रब्दभेदादिकायै कने वह समर्थ होता है, उसी तरह युनि मी 
आराधनाओंका हमेधा अम्यास करसे मरणकालम्‌ं रत्य सिद्ध करेगे. 


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-मूलाराघना [| विेप--गाधा्मे जिद्करणो यह रचद है, यदं करण शब्दके अनेक अथ ह, स्पाटिविपययो ग्ण || 
७२ || करनेवरे ञान जिनसे ठ्न दोति है रे करण दै. अर्थात्‌ करण शब्दका इमि देसा अर्थ होता ४ इदियति स्पा- || ! 
९६|| दिक पदाथाका ज्ञान उलन होता दै. दर्थ उत्पत करने कर्व जो अतिद्यय सदायवः दता द उसको भी करण [|| 
|| अथात्‌ साधकतम कहते ह, जते देवत इ्टादीसे ठगी पाटता ६, इद्हाडीके यिना रकदीका काटना देवदत्तसे । | 
| असंभव हं अर्थात्‌ लकड काटनेमं देवदत्तो दृव्छादी थतियय मदत करती. हे अतः यड दरण सभवत कटला- (({८ || 
|| येगी, करण य्दका वदं कां सामान्यकरिया देसा भी अर्थं माना है, यथा इल्‌ करणे, प्रस्तुत प्रकरणम करण ॥ २२|| 
| राब्दका क्रिया एेसा अर्थ इष्ट दै, “ जित ' शब्दका जथर जपते तामे रखना, पू्णदस्तगत करना एेसा है. ञते-- (८ | 
|| नितमा्थः स्ववयीङृतमार्यः अथीत्‌ निसने पतनी अपने स्वाधीन रका एमा मनुप्य,. प्रस्तुत प्रकरणम |: | 
| ` चिदकरणो स्वनशीकृतकियः ' अरथत्‌ चचचाव्फो धुमाना,  रन्यभेद करना इत्यादि ` जिया निष्ण (ॐ 
(|| उसमे न चुकनेवाला एेसा समचना चादिये, ‹ कम्मसमत्थो ' इस समस्त छब्डम्‌ कम्म राब्यके अनेक अथ हे जेसे- ४ 
|| मिथ्याद्न, अविरति, प्रमाद, कपायकि दार जो ्ानादिकः गुणक ग्रतिबद्र॒ करके साम्ये युक्त क्रिये जते (|: || 
| 2 उनको करम ते दै, अथ॑ ज्ञानावरणादिकोो कुप कते द. वर्वकी होनेवारी कियाय दवारा जौ व्याप होता । | 
|| द उसको कर्मकारक कहते दै, क्मैकी व्याकरण शादे द्वितीया होती दै. जसे घ“ कर्मणि द्वितीया ` ‹ पृं (२: 
| करोति देवदत्तः इस वाक्यम देवदत कर्त क्रियासे षट्को व्यापता दै अर्थात्‌ षट कर्ृलवक्रियासे व्याप्य दता [| 
(|| ६. कमै बदा ' मिया" रेसा भी अथै है, यदा क्म द्द कियााची समदना, सते (क ब कष 0 
|| र.कोनसा कायं करता है ११ कम्पसमथो मका अर्थ छुट जाना, प्रहार करना, ठोकना इत्यादि कर्म ब्दका (२६|| 
(| अभिप्राय यां समञ्चना चाहिये, ५ | 
४ जो जिस कायफो साधनेकी इच्छा रखता ह बह उसके साधनभूत सामग्रीमे प्रथम प्रयत्न करता दै. जसे (19|| 
शवुको सारनकी इच्छा करनेवाला मलुप्य मारनेकी साधन धेत शास्र विचा पठता दै उसी तरह यनि भी || ७२ 


आराधना्आंका अभ्यास करये मरण कारम रतनत्रयकी प्राप्ति कर ठेते दै, 
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असति पीडामुपजनयन्ति । दयेचभूता सर्वत्र समचित्तता सामण्ण चि स) छुणदि ४ 
णिष्वमवि नित्यमपि सर्वदापि 1 जोगपरिपकम्मं योगराव्दोऽ्नेकार्थ. 1 1 रहण › इ्यात्मपदेदापरिस्पदं 


१ स पुस्तके निमित्तभूतः इति पाठः 


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१ इदानीं हेतो. पक्षधमेयोजनायाद-- 
ई इय सामण्ं साधू वि ुणदि `णिञ्चमवि जोगपरियम्मं ॥ | जा 
४ तो जिदकरणो मरणे श्आाणसमत्थो भगिसंति ॥ २१ ॥ ५ १ 
| आमण्यं सर्वदा कवैन्परिक्मं पजायते ॥ \{ 
अआग्वस्त ( अभ्यस्त ) करणः साधुध्यानक्षक्तो मृतौ तथा ॥ २४ ॥ |¦ 
सामप्णमिदि । श्य एय । सामण्णे समणस्स भावो सामण्ण समता इत्यभियुक्ता || { 
ः 
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१.०.९५ 
[2.4 


(&¦ || जिषिधवरैणासदायमाचषटे । कचिरसवधमाश्रवचन- ‹ अस्यानेन योग ' इति । कचिद्त्यानवचनः यथा * योगस्थित › इति ) भाविः 
४ दृदयं परिगृहीत, । ततो ध्यानपरिकरं करोतीति यावत्‌ । रागदवेपमिथ्यात्वासंश्िष्टे अथैयाथात्म्यस्पाक्ति प्राततानिवृत्त 

| विपयातरसंचररं क्षान ध्यानमिस्युच्यत्ते । अभावितसमानभावोऽनधिगतवस्तुखद्धावश्च ध्यातं न क्षमते इति भावः 
| तो तत. पश्चाप्जितकरणो इत्यश्च करणशचब्द्‌; अंतःकरणे मनासि वर्तते ततोऽयमथैः । खचशशीरूतचित्तोऽं मरणे 
|| भवपयौयनाश्चेलाया ! क्ाणसमत्थो ध्यानस्यैकाग्रचिन्तानियोधस्य । ध्यानखान्दोऽघ् भशस्तध्यानविपये अष्योना शुभ. 
49: | योनौरकतियेग्यतिनिेतवनधवणयो, । योगे परिकमीणे सदात्मन. अचृच्तत्वात्‌ अयत्नसाध्यता ¦ धर्म॑श्ु्घयोर्निवेतेने 
9६ समत्थो शकः भविस्सति भविष्यामीति ॥ 





यो यच्चि कीति स तत्परिकमौणि पराक्‌ भ्यदते । यथा रिपून्निषासुस्तद्धननक्रिययोग्यायामसखषिष्ठायामिति || 
दशेयित्वा इदानीं हेतोः पश्षधभत्वयोजनायाद्‌-- 1 
मूलारा--इय प्व । सामरण्णं जीवितमरणादिपु समानस्य भावस्तत्‌ समचरितर्त्व, श्रामण्यं षा || 
चारित्रमित्येः । जोगपरियम्मं सद्धयानपरिकरं तथा चोक्त ¢ 
संगत्यागः कपायाणा निग्रहो ्रवधारणं ॥ 

॥ मनोऽक्शाणां जयश्चति सामी ध्यानजन्मन ॥ प 

१ लिद्करणो स्ववशीकृतमना; । करणं द्यत्रान्त.करणम्‌ । स्ववक्षीकृतचित्तन्द्रिय इति वा ग्राहम्‌ । ज्घ्ञाणसमत्थो || 
पमञुक्ठध्यानसमर्थः ॥ 0 








(1 


यदी आशय आगकी गाथाम आचार्यं स्पष्ट करते १-- ( 
॥ 11 


॥ व मरण, साम्‌, जलाम्‌, श, मित्र, सुख, दु"ख इन चीज रागदष रदित दोना 
ष समता कते ट. यह्‌ समता ध्यानाम्यास करेमे सहायक दोती दै, जो ेसी समता हमेशा धारण करते है, | 


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0 मन अ द्विक अपने अधीन रक्वा है जथीत्‌ जो लितेद्रिय ओर नितचिच है बे साधु मरणसमये 
इति अथात्‌ नरके तिथगगतिको द्र कएनेवाके एेसे धर्म व शुक्ल ध्यान करनेमे समर्थ दोग, 
पेयेषथ-- जीवित, मरण, लाभ, असाम इत्यादिकरोमे ज आत्मा रागद्वेष रहित है उसको समान कहते 


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ह, एते समान आरमाका जो स्रमाव उसको सामान्य अथीत्‌ समता कते ह. ‹ समान ` इस ॒शब्दकी प्रवृत्ति 
जीवे हनेका फारण समता दै. अथौत्‌ जिसमे समता दै उसको समान कहते दै. जीवित मरण, राम अलाभ, 
छख दुःख, वधु व दघ श्नमें अथीत्‌ जीवित, लाभ, सुख, बधु इनमे रागमाव करना ओर मरण, अलाभ, दुःख 
ओर शत्रु इनमे 2प-अप्रीति रखना यदह असमानता है, इस असमानताका स्याग करना दी समता ई. जीवित मरण 
इत्यादि्कोका यथार्थ स्वरूप समञ्ननादी समता दै, परंतु उसमें प्रीति व अप्रीति करना यह समानता नदीं है. 
ईदियादि प्राणा धारण करना यह जीत शब्दका अर्थ दै. परंतु हदरियादिप्राणोका अस्तित्व आयुकर्मके आधीन 
दै. षद आयु जव तक रदेगी तथ तक जीवित टिक सकता दै. वह जीवित मेरे आधीन नदीं है. क्योकि जीवितेच्छा 
होकर भी प्राण चे जाते है, सर्व जगतके प्राणी हमेशा प्राण रदे एेसी इच्छा करते हँ परत आयुका वयोग रोनेसे 
्ार्णोका निगीमन होता दी है उसको बे रोकनेमे असमर्थ है. 

२ मरण शद्रियादि प्राणे आत्माका अलग हौ जाना मरण दै. अथौत्‌ प्राणका त्याग होना मरण है. 
“ प्रद्‌ प्राणत्यागे * ेसा मृद्‌ धातुका अर्थ है. प्रार्णोका त्याग अथीत्‌ आत्मासे प्रा्णोका योग दोना, आत्मासे 
उनका अलग दोना. आयुकमं संपूरणं गल जानेस प्रा्णोका वियोग दीवा है. विष, शू, वाण इत्यादि प्राणदारक 
पदारथोका सथोग होनैसे द्रवयेद्रियोका नाश दता रै, ज्ञानोपयोम दषनोपयोम ये भाव प्राण है. विप शस्रादिकोका 
सयोग होनेसे ज्ञानद्चनादि आवरण कर्मका उद्य होता है, जव इन कर्मोका उदय हता है तव लब्धिका विनाश 
हो जाता है, वी्यान्तराय कर्मका उदय होनेसे कायवल, वचनवर, ओर मनोयल इनका नाश दता दै, यख वंद 
कनेसे, नाक चद कशनेसे तथा शछेप्मादिकोषे उनच्छरसनिश्वास प्राण नष होते दै. 

. सामांतराय कम॑का कषयोपशम होनेसे इष्ट पदार्थकी प्राप्ति होती है, तथा लाभांदरयक्रा उदय दनेसे 
अकाम होता दै, श्रीतिरुप परिणामको सुख कहते दै यह प्रीति परिणाम जीवम साता वेदनीय कर्मके उदयसे रोता 
है, द पदाथं साथ रीनेसे मलुप्यको आनद दोता दै, अतरग कारण साता वेदनीयका दय ओर चहिरंग कारण 
द्ट वस्तुक प्रापि इन दोनो्षे जीवम शीति उस्पन् होती है. 

पीडा स्प परिणामक दुःख कहते दै. वह असाता वेदनीय कर्मके उद्यसे जीवमे प्रगट दोता है, 
सेसारमे रमण करनेवाठे जीवके कोई नियत वांधव नदीं ६, जिसके उपर यह जीव उपकार करता ई बद्‌ 


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| | छ जते १. अत च गणन नव गय सार 
10 बस्तो उदी समाम्‌ त पना. पुष उदयसेदी जीवो स्वं अकारे सुख भिरे है, ||. 
५ < पठ भृष्रदित जीवको सुखदायक पदारथोका संयोग ठनि पर भी || 
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ख नदीं शेता दै, असाता वेदनीय कर्मका खदय दो ती पुत्र माताका ह 

1 ॥ ५ ¶ त्याग कृरतादह, ३ 

| क 1 कमका उद्य न होगा तो कोई भी अपने क र 

| पा उदय न दो तो बराह तर जीवको दढ भी पीटा नहीं दे सकेगा, त 

| | रसम समता चोगपरिकर्म हे अथोव्‌ छभध्यान-यरमष्यान आ गुष्यान उत्यन्न होनेमे धल 
| ॥ समस्त रब्दमं जो थोग शब्द्‌ है उसके अनेक अर्थ है. जेसे-“ योगनिमिनं ग्रहणं " ४. 


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मूलाराघना ! ‡ रतपरिकरो राजयुघ्रो व्यधनादिकासु करियासु उपगतकौशदट, शिया यदरणादिकां सेषाद्य यथाफटं ¦ {¦ आश्वा 

०५ १५ भोति शति पलदुचर्गाथयाचे- {\ 
1 जोगाभाविदकरणो सतू जेद्ण जुरगम्मि ॥ ५९. 
(४ जह सो कुमारम रजवडायं वल हरदि ॥ २२ ॥ 0; 
0 कृतयोग्यक्यो युद्धे जगतीपतिदेदजः ॥ | ४ 
५ 9 
0; आदत्ते विद्धिपो जित्वा वलाद्राञ्यध्वजं यथा ॥ २५. ॥ | 0; 
1 विजयोदया-जोगाभाविद्‌ दरत्यनया । जोगाभाविटकरणो परिकर्मणा असरवयवर्तितव्यथनताडनपरद्रणादि- 0; 
६ न्य । आमावित इत्यवाद्‌ धां युक्त, । तथा च मयोय.--जाधूमित, शा धूमेन पररिपूणमित्यथं ।. सन्‌ |{ 
(0 चू । जदूण जित्वा । उद्रगम्मि युद्धार्थं संस्छतो देषो यद्धरगमिल्युच्यते तत्रः । जद यथ्रा । सो खः (१ 
५ भावितात्मा । एुमारमद्ो प्राणिना कारतो ऽवस्थाधिशेषो दवितीय कुमारत्व नाम । तद्ोगाद्राजपुत्र, मार स 10 
६ प्व मल्ल. । रज्रपडाग राज्यध्वज । वा बलात्कारेण । हर्दि हरति । गृष्ठाति ॥ ध 
५ न> ~ 
(0 0; 
{ (1 प्राक्‌ परिकसेभावनाया. फलं द्टान्ते मदश्वं दाष्टान्तिके योजयितुं गाचाद्वयमाद- + 
) मूखासः-जोगाभाविदकरणो योग्यया परिकर्मणा मावित्तमसषृतवरतित करण व्यधनादिक्रिया येन । जुद्धर्गम्मि 1 

६ उदर्य संसत देशे । खनपडायं राज्यध्वजं । वला वखात्कारेण । ह्रदि गाति भत्यानयतीत्यथै, | 0; 
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| जिसने रस्तपि्याकी सामग्रीका खूब अभ्यास किया ई एेसा राजपुत्र रक््यवेधादिक क्रिया _ करनेमे चतुर ५ 
‰ शो जाता दै, जीर सको मारकर अथवा पकठकर रव्यादिकका फक माह कर केतं यह आयेकी गाथाम | 
। ॥ आचार्य कहते है 11 
(८ टिन्दी अ्थ-रक्ययेध, ताढन्‌, रहार करना इत्यादि छया करनेमे यविश्य चतुर, तरण, पटिलवानके |! 
[ समान यकषत देषा रनु द्‌ करके दानमे शयो जीतकर ये बलात्कारे राज्यप्वनवो एय करवा |“ 
(1 है. उसी तरद्‌ मुनि भी मोदरिषको जीतकर बलात्क्रारसे आराधनापताका, हर रेव दै. ेसा आगेकी माधा ¶ 
|: आचार्य कहते दं. उप्यक्त गाथा चान्त स्य हे-दारछान्तिक गाया यदा आचाय कहते है, ध ७७ 
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पूलासयपना 





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मूलारा--भाविदसामणो भागभ्यस्तसमभावः । मिच्छत्तादी मिध्यात्वासंयसकपायाछ्चभयोगान्‌ । विजेदृण शद - 


विचिधं घा प्रतिष्टत्य । आरा्गापायं आराधनेन पताका चेन्द्र तां मिध्यात्वादिशबुवं 1 यदिषा 


नीं होता है, यदि वह भी उत्पन्न होगा तो आकादयपुप्य, ओर खरमोरका सीग भी क्यों न उत्पन ती १ क्योदिः ' 


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द श्र ९-4-92 2 न्दे क 4. 2 प ६- व 9 
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वधय ककय कमम 
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पे भीतो असत्‌ ही है. सकशपृष्य असत्‌ हे तथा षटादि भी उसके समान से षटा- [4८६ 
दिक अथवा षटादिकसे आका पप्य वनते दे एसा मानना पएठेगा, पटादिकसे पादिक दी उत्यन्न होते है, ओर ॥| 






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वसतुमे जो अभाव माना गया ह वह्‌ मावसे भ नदी. अथात्‌ त ह्मी अभाव कहते 
दै, वस्तु खस्वस्यसे जेसी भावात्मकं मानी है वैसी परस्वसूपसे अभावात्मकः भी मानी है अत. प्रत्येक वस्तु 
भावामावात्मक है. अतः निस्यत्वेकान्तवाद अयुक्त दै, एेसी तत्वशवद्धा करनेसे वस्तु नित्य दयी है यह मिथ्या 
पराजित होता है, 

व चह पिले क्षणम उत्प होकर न 


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० (० यदिनषटहोती हीहैतो 
अतः वस्तु क्षणिक है यह मानना अयुक्तेयुक्त दै. 
नित्य भी पदार्थं कार्यं नदीं कर सकता दै, वह यदि कार्य करेगा तो क्या रमसे करेगा अथवा एकदम 
करेगा {एसे दो प्रश्न यदा उपारत होते है. = करेगा यह आपका कथन योग्य नीं 
है, क्यों किं काथं का जन्म होना कारण में विद्यमान जो स्वभाव है उसके आधीन है ओर नित्य पदारधमे कार्य 
उत्पन्न क्रनेका स्वमाव सदा ही विद्यमान दनेसे स त अतः कार्थमे कम केसा रहेगा १ एकदम 
सच कायं होगि. यदि दमे सामर्थ्य होता हुवा भी कार्य न होगा 
कायं है ेसा मानना योग्य नदीं दै. जसे यवर्बाज समीप तते १ 
बीज कारणरूप नहीं मानते द वेसा नित्यपदाथं कार्ये प्रति कारण नहीं होगा. यदि सर्वं कार्य युगपत्‌ नित्य 


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पदार्थसे दो जते है तो प्रथम स 


दोगा. प्रु पदारथ द्वितीयादि क्षमे भी 





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कारण हो सो व्याघ्रादि दिस प्राणीही मरणोत्तर स्वर्गादि सुखको ग्राप्त होगे. अत. दसा खगेदायिनी है यद मानना आशाश्च 
अयोग्य दै. 

खम ब मोक्षकी पाक्षिके उपाय व खर्गादिक उपेय इन दोनोका प्रत्यक्ष दर्ीन नहीं दै. अदमानसे मी 
इनका ससम नदी नाना जाव ६ कयि बह भ अत्य विना उल दता नी आगमे उपाय ओर्‌ उपेयका 
ज्ञान होता दै अतः आगमका आश्रय उना ही योग्य है, बह आगम्‌ जिसने रागदवेपका नाश किया है एसे सर्वज्ञ 
जिनेश्वसे स्वा है. अतः बह दी स्वर्गादिक उपाय ओर उपेय सुखादिकका प्रतिपादन करता है, 

कपिरादिक अन्यमत भणेताक्रपि असुर्वजञ थ अतः उनका आगम अच् पदरथ ज्ञान कराने उपाय दी 
नदीं सकता, कपिलादिकके वचन प्रत्यक्ष ओर अदुमादिक प्रमाणोसे विरुद्ध द अतः वे रथ्यापुरुपके समान 
अभ्रमाणर्है, 

शव्द नित्य है यह कहना भी योग्य नहीं है यदि प्रे नित्य है तो सर्वं शब्द निलय हेनेते, ुरुपोकि राग 
पादि दपि बै अषि होने राण मानने पे जिनागमसे सा दुःखोतयततके रये कारण दै फसा अनुभव 


(4 श (1-2-33 कीर ॐ 13 
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ग-23 


६] 
आता है ह अतुः िसाको सुखकरा कारण समघ्ना विपरीत र [मभ्यात्व्‌ हः दस विपरीत मिथ्यात्वका सद्यज्ञानसे एनि- / 
राज्‌ पराभव करते ह मिथ्यात्व, असंयम, कयाय देसे शुओको जीतकर वे बलात्कारसे आराधनापताका हरण ‰ 
करते द, ४ 

२ - ¶ )} 
चिरमभावितरत्नचयाणामतर्मुहतकारभावनाना सिद्धिरिष्यते तत्कि चिरभावनयेत्यस्योच्तरमाचट-- 1 
पुव्वमभाविदजोग्गो आराधे मरणे जदि वि कों ॥ ध 
खण्णुगदिषेतो सो तं खु पमाणं ण सव्वत्थ ॥ २४ ॥ ध 
यव्य भावितयोगोऽपि कोऽप्याराधयते ति ॥ 
त्यम न सर्वच स्थाणुमूलनिधानवत्‌॥ २७॥ | २ 
पुव्व पूर्य व । यमाविदजोग्गो, अभावितपरिकर' । आराधे आराधयेत्‌ 1 कि मरणे रत्नत्रयाजुगत- ४ 
भव पयीयश्रख्य । जदि पि 1 फोर कथित्‌ । खण्णुगदिषतो स्थाणुद्टन्त ! सो स. । तं खु तदेव । अरृत- ५ 
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परिकरस्य कस्यचिद्ररनचयसमापन्नं 1 सव्चस्थ सवत्र ! ण पमाणं न श्रमणे । अर्थाख्यानमन चाच्यम्‌। 
पव पीठिका समाप्ता ॥ 





रि न~ 


मूढारा-- जारादेज्न मरणं रत्नत्रयाञ्गव भवपर्यायमलयं ङुयादितयर्थः । खण्णुगदिद्तो सो स्पाणुद्टान्तः || 
सः । तं खु । तदेव अछ्रतपरिकमंणः कस्यचिन्मरणे रत्नत्रयपरिणमनं | सव्वत्थ सर्वत्र सर्वेषु | न पमाणं न गमक यो यो ८6 


जीवः स स सर्वोऽपि अचछरतपारिकर एव भरणसमाधिमुपेयात्‌ । यथा कथित्‌ भासैदधो जीव इति व्यघ्तिरभावात्‌ । 


पूर्वममार्धतयोग्यो यचप्याराधयन्मृती कश्चित्‌ || 
स्थाणौ निधानरामो निदर्शनं मैव सर्वत्र ॥ 
पीठमासनमिव समस्तर्रथाथेसंमहस्याधारभूतत्वात्‌ । श्टोकः 
त्यक्त्वा संगं सुधीः साम्यसमभ्यासवञाज्जव । 
समाव मरण छव्ध्वा इन्त्यल्पयति वा भवम्‌ ॥ 
इति मूटाराधनादर्पणे पीटिकाप्रतिष्ठा । 





जिन्दनि बहूतकारपयंत रतनवयाराधन नहीं किया है अर्थात्‌ अन्त्हृतैकालपर्न्त ही आराधन किया दै |: र 
उनको भी मोक्षाम दोगया दै, अतः चिरकाररत्चय भावनाकरी आवर्यकता नहीं दै एसे प्रभका उत्तर आचार्यं ||: 
कहते ईै-- 


नेसे नेवलाभ हुवा ओर स्त॑म गिरनेपर उसके नीचे 
उपायसे निधिलाभ होगा यह समन्नना नितांत 








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भूलमरा समक्षना वाये, अत. इस चातके जुसार रलत्रयाराधना मरणसमये किसी एकादे मलुप्यको द गई 
हो तो सर्वत्र यह नियम प्रमाणभूत नदीं है. 
पीटिफा समाप्त. 





मरणागि सनत्तरस देिदाथे तित्थंकरे्िं जिणवयणे ॥ 
तत्य वि य पेच इह संगहेण मरणाणि बोच्छमि ॥ २५ } 
विस्तरेणागमोक्तेपु मध्ये सक्षदच्रस्वदटम्‌ \ 


मरणान्यच् पंचैव कथयामि समासतः ॥ २८ ॥ 


तो उश्वदि भवधारणम्डगकम्म भवाउत्ति ॥ 
इति अदुबेदोनेव जीवो जायते जीवति च युप पवोधेयेन । अन्यस्पयुय उद्ये सति सृतिभुपेति पूर्वस्य 
चायुप्कस्य चिना 1 


१ खन्‌ प्राणत्यागे इति ख पुस्तके पाठः! २ ख-आत्मनेति । 


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तथा चोक्तम्‌- ५ 

आउगवसेण जीवो जायदि जीवदि य आउगस्खुदये । ५१ 

अण्णाडगोदये चा मरदि य पुव्वाउणास्ते वा ॥ इति ॥ |¢ 

\ _ द्धाशब्देन काठ उच्यते । माउगश्ब्देन द्रव्यस्य स्थिति, › तेन द्रव्याणा स्थितिकाल सद्धायुसितयुच्यते इत्यर्था ५ 
पक्षया दूव्याणामनाद्यानिधनं भवत्यद्धायु । पयायाथपेश्षया चतुर्विध भवत्यनायानेधनं, सायनिधर, सनिधनमनादि, 4 

1 सादिखनिधनमिति 1 चेतन्यरूपादिमत्वगतिरिथतिदेतुत्वदविखामान्यपिक्षया अनायनिधना स्थिति । केवरुतानादि- | ‰ 
कानां सा्यनिधनता । भन्यत्वस्य अनादिसनिधनता, सादिसनिधनता फोपादरीनाम्‌ । भथवा द्रव्यष्योधकाटभावाना- | १ 
॥ धित्य चतुर्विधा भवति स्थिति । पतस्याद्धायुपो वदान मवधःरणयुपो निरूपणा भवति । आयु सिताना कर्मणा | 0; 
\ पुद्रल्दरून्यतया आयु स्थितेन दरव्यस्थितेरत्यतान्यथात्वं । अथवा _अनुभूयमानायु सक्षफयुद्ररगखने मरणं । तानि || 46; 
मरणानि । सत्तरस सपदद । देसिदानि कथितानि । तित्थेकरेर्ि तीकं । जिणवयणे जिनानां वचने । नतु तीर्थक- | | 4 
रेष्छानि इत्यनेनेव गतं किं जिनवचनग्रहणेन ? जेय दोप. । जिनदब्देन गणधर उच्यन्ते । अंतरेण चराव्द्‌ समुच्चया- || ८; 

0 थेगति । तत्राय सवध.-जिनवयने च फ सपतदुशमरणानि । पतेन तीश्रखतो गणधराश्च मर्णविकस्पानुपपरादितवन्त । [19 | 
तदुभयवचनकिद्ध ्रमाणमविक्कनीयमित्येतदाचय .९ आएवीचिमरण २ तद्धवमरण ३ अवधिमरणं ४ आद्िवतायं ५ | 19 
वारूमरणं द पडितमरणं ७ आसप्णमररणं ८ वाकपंडिद ९ ससछमरण ‰° चलयमर्णं ११ वोखटमरण १२ विप्पराणस ५0 | 

मरण १३. गेद्धपुदधमरणं १५ भत्तपच्चफत्ाणं १५ पाडवगमणमरणं ९६ दइगिणी मरणे १७ केवलिमरण चेति । तेषां सरूपता |} $ 

|| यथागमे सक्षिपतो निरूप्यते ॥ । ५ 
चीचिरा्दुस्तस्माभिधायी दद्‌ ल्‌ बीचिरिव वीचिरिति ! भायुप उदये वक्ते । यथा सुद्रादो चीचयो नेरत- ||) 

दाब्द्‌र षद तु य यु दरदा वीचयो नेरत- [24 

चेणोद्च्छन्ति पवं क्रमेण यायुष्कास्यं कव मजुखमयसुदेति _ इति तङ्दय _मावीचिशब्देन भण्यते । आयुष अजुभवन 10; 

जीविते, तच्च मतिसमयं जीवितभगस्य मरणं । अतो मरणमपि अघ आवीत उद्यादनतरसमये मरणमपि वते दति। | 
तत्पूनरचीचिकामरण अनादिसनिधनं भव्याना । नन सिद्धानमिच मरणं विच्छित्तिमुपयाति नेतरेषाते च न भव्या । भवि- | 12 


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भ्रयोज्य ख्पेषट्य आयु उदयो नान्यथा ततो नायुष्कद्योरुद्य' \ प्वमेकस्यायुप्कमेण प्व भरूतिस्देव्येकस्यात्मनस्त- 
स्मदेकेकापुष्कयरूतिगलनरूपामेच तिसुपेति । तदेतत्प्रृत्तिमरणं । 
भवधारणकारणत्वपरिणताना पुद्लाना स आत्मन्‌ कपायपारिणाम 
सदकारी पुदटलाना स्निग्घताय 1 परिणापनेकारण तु तदेव पुद्रलढरवयं ! खा चेषा तिवो देणोनघय- 
सिशत्सागयोपमाणा यावन्त समयास्तावद्धेदा उत्कषस््थिति. । अतयुहतेभवा परा । तस्या वीचय वप्रः मभणावस्थि- 
ताया विनाछष्दात्मनो भवति स््थित्यावीचिकामरणं । 
भवातरप्ाप्षिरनतसेपदूधभवाविगमन तद्धवमरणं । तत्वनतडा प्राप्त जीवेनेति क्षातव्य तेन॒ तद्धवमरण 
नदु । 
न अनुमवावीचिकामरणसुच्यते--फमेषुद्रराना रस॒ यछुभव इत्युच्येत, स॒ च परमाणुषु पोढा इृद्धि्ानि- 
ख्पेण आवीचय इव कमेणावस्थितस्य मलयोऽुभवाचीचिमरण । 
शा पद्रलाना भ्रदेशा जघन्यनिपेकादारभ्य पकादिदृद्धिक्रमेणावास्यतवीचय दव तेपा गलनं 
प्रदेदावीचिकामरण 1 
अविमरणं नाम कथ्येत--यो यारृश मरण साय्रतसुपैति तादृगेव सरणं यदि भविप्यति तदवधिमरण । 
तदिद्िविध देशावधिमरण सवोवधिमरण इति । 
ततर सवोबधि मरण नाम यु सघत श्ररृतिर्वत्यचुमवध्रदेश्ेस्तयानुभूृतमेचायु प्ररृत्या- 
ज न देशतो यदि तदेश्ावधिम भवति दे तो 
 यत्सा्रतमुदे्याय्ः वधराति रणं । एतदुक्त देशत सवत 
वा साटद्येन विशेषित ससगभिमरणमिति । 1 साप्रतेन मरणेनासादश्यभावि _ यदि मरणमा॑तमरणं_ उच्यते, + 


५ 
२. €. ग< > (9 2 प सु < 259; न= = भ्न, ^ "524 नर. 601 
न 


1 
द््ौनवाला. । वस्तुयाधात्स्यगरादिन्नानन्यूना क्षानवाखा. । सचारिजा न वादा । पतपा वाटानां मरणं 
स 1 एतानि च अतीते काले अनतानि । अनंताय खतिमिमा प्रपद्यते । इद व ग॒हीत, नेतर्वाखा. 
१ यस्मात्सम्यग्द्ेरितरवात्वे सत्यपि दर्शनपंडितताया, ख द्वावात्पाडेतमरणमेवेप्यते । 

दश्च॑नवास्य पुन, सक्षेपतो दिविधं मरणमिम्यते । च्छया प्रवृ ्तसनिच्छ्येति च । तयोखदयस्चिनः धूमेन, 


२ 
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[॥ ॥ 


~ [+ 7 ^. नक. 
(2 





| 

| ॐ 

(| राखेण, विभेण, उदकेन, मयत्मपतिन उच्छरवासनिसोधेन, अतिशीतोध्णपतिन, . रज्वा, श्ुधा, दषा, जिदोत्पारनेनः | 

८८ ॥॥ चिष्दादयार्सेवनया वाखा खि टौकन्ते, कतश्िन्निमित्ताज्ीवितपरित्यागेपिण. काटे अके वा सभ्यवसानादिना यन्मरणं || 
9 || जिजीविपो. तद्द्वितीयं । पतेर्वारमरणैद्गतिगामिनो भियन्ते । विषयव्यासक्बुद्धय. यक्षानपरटखावगटिता कद्धि- ||: ॥ 

)६ $ 1 ति ॥ | 


॑ . 1 मल्यादिषं पारि न | 

पडित. । सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिदयारविदिखष्मसापराययथास्यातचारििषु कस्मिश्ित्पदरत्तश्चारिघ्रपंडितः । || 

| इद्‌ धुनने शानदशेनचारिघरपंडिताना मधिकार, । व्यवदारपेडितस्य मिथ्या  चाखमरण यथा भवति सम्यण्टे || 
स्तदेव दंदौनपेडितमरण भवति । नरके, भवनेषु, विमानेषु, ज्योतिष्षु, वानव्यंतरेषु, ढीपसयुद्रेषु च क्षानपडितमरणानि च 

६६|| तेष्वेव । मदुष्यलोके एव केवख्मन.पर्ययज्ञानपडितमरण भवति । 
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न च तद्सर्िष्वस्ति । मार्गस्य दपण, मार्ग नादान, उन्मागीपरूयण, मागौरूपणे , मागस्थाना भदकरण मिथ्याद्दौ- 
नशव्यानि। 


॥ दा ठ्पा,। 
वेदणावसटमरण द्विभेदं समासत. । सातवेदनावदयातेमरण असातवेदनाचरातेमरण । शारीरे मानसे 
वा दु.से उपयुक्तस्य मरण इ.खवद्ातैमरणडच्यते । यो डेन मोदसुपागतस्तस्य मरणमिति यावत्‌ । तथा शारीरे 
मानसे घा सुखे _ उपयुक्तस्य मरणे स्रातवदहातमरणे । 


कपायभेदात्कपायवदयातमरण चलुर्विध भवति । अचुवंधरोपो य आत्मनि परर उभयत्र वा मारणवक्षो 
मरणवश् भवति । तस्य करोधवश्चासैमरणं भवति । मानवदार्तमरणमण्टविध भवति । फुटेन, रूपेन, वलेन श्रुतेन 
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न केवट तीर्थकरैमेरणानि सप्रदश्च देशितानि यावता गणधरेरपि स्वसूत्रे तानि ताधन्त्येबोपनिवद्भानि । उप्तरवाक्य च .|| श 
$ ॥ शब्दोऽत्र योज्यः । तत्यनि तेष्वपि तीर्थकरोपदिषटगणधरोपनिवद्धेषु सप्तदशमरणणु सध्ये प॑चविधसषगदेण-पचाना | 
( प्रकाराणा सष्टेपेण ¦ एतनद॑युगीनविनेयजनानुरोधेन म्रशचस्तेतररूपतया शे गतानि पच मरणान्यहं वक्त्यामीति 





१ तत्र ्रतिक्षणमायुःक्षय आवीचिमरणं । सखदरामबुपु चीचीनामिव जायुः पद्रराथुष॒ रसाना प्रतिस्मय 
उदरयदूय | चिख्यनात्‌ । २ मुज्यमानायुपश्चरमसमये मरणं तद्भवमरणं ३ याद्देन सरणेन पूर्व भृतस्तादरोनैव मरण- 
मवधिमरणं | ४ देशतः सवतो वा मृतिस्थित्यलुभागगरदशसादयेन ५ विदोपितत्वात्‌। म्ृिस्थित्यदुभव 


५ मायानिदानमिध्यात्वठक्षणराल्यसमतस्य मरणं सस्यं मरणं । ६ दि प्रविश्य मरणं गृद््ष्ठमरण 
७ जाणनिरोध छत्वा मरण निघ्राससरणं । ८ दरेनज्ञानारि्राणि , त्यक्वा मरम युतखटमरथ ९ पाद्ैस्थस्पेण 





हिन्दी अर्थ श्रीजिनेशरोने जिनागममे मरणेकि सतर प्रकार कदे है, उसरमेसे संग्रह करके मे 

( शिवकोय्याचार्यं ) पांच मरर्णोका खरूप कहता हं । 
विरेषार्थ-मरण, विगम, बिना, विपरिणाम ये एकार्थं वाचक अथोत्‌ मरणके वाचकं दाबद्‌ ई. मरणके भूव 
मी मन पत मण प हेव स त त जीवन 
जिस्‌ पदाथ स्थिति होती है वही पदार्थ न्ट भी होता है. 


~ न. 24 72 2. 
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५१२३ आश्वा 


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अवस्थाय संपूर्णं पदार्थोकौ होत ई. देसी यदि प्राक्ेया माने तो उत्प हुए पर्यायका जो नाश उसकोदी मरण 
कहना चादिये, देवपना, मलुप्यपना, तिर्थचपना, ओर नारकपना इन पायाा नाद्य दोना यद यहां मरण श्ब्दका 
वाच्यार्थं दै. अथवा भागो त्याग चह मरण शब्दका अथ दै अत एव ^ मृद्‌ प्राणत्यागे ' एसा भर धातुक अर्थ 
६ धाहुपाठे दै. उसी तरह प्राक रहण करना यह जन्म चब्दका अथै है, अथौब्‌ माण धारण करना य़ जीनित टै 
प्राणोकि द्रव्यप्राण च भावप्राण रते दो भेद्‌ दै स्यशनादिक पांच ई्रिया, मनोबरः चचनवर ओर कायबल 
सनस ओर आयु रते दस भेद द्र्य रागि है. भे द्वपभाण पुद्गलात्मक ट, ज्ञान, द्रीन, चासि ये 
| मावम्राण ई. मावप्रा्णोकी अपेक्षासे सिधाभें जीवित माना गया है. 


अवाः 


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श आुष्यके दो भेद द पटिला भेद अद्ायु ओर दुसरा भेद्‌ भवायु, भवधारण करना बह मवायु है, ||; 
५ || शरीरको भव कहते है, इस श्रीरको आत्मा आयु कर्मके उदयकता साहाय्य प्राप करके धारण करता दै. अतः शरीर ॥ 
|| पारण करने असमर्थ एसे .आयुकरशको भवा कृते है, इस विषयमे अन्य आचाय एसा कहते है 1 
(0; देको भव कहते है, बह मब आयु कमेसे धारण किया जाता दहै. अतः भवधारण करनेवाले आयु ध 
४: | कर्मको भवायु एेसा कहते ई, आदु कर्मके उद्यसे दी उसका जवन स्थिर दै, ओर जव मसत आ रमते मित्र 4 
| अन्य आयु कमेका उदय दता है तव यद जीव मरणावस्थाको प्रा होता है. मरण समयमे पूया विनाश 1 

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धः होता दै, 
ध पूर्वाचार्यं ए श्वा ५ है 


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यैतन्यादिकगुण, स्पादिकगुण, गतिदेतस्व, स्थितिदेत॒त् इप्यादि सामान्य धृमपिक्षया द्रव्योकी अनाय- |! 
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निधन स्थिति है ध दरन्योमिं अनादिकाठते विथमान है ओर इनका कभी भी नाशन हेता नदी. 
अत. इनकी ` क चिद्ाननि मानी है, जीषम मव्यत्वयुण, अनादिकालपे हे परत क्तीके समयमे 
उसका नाश होता है अतः बह अनादि ओर सनिधन दै. नि व 
कोप, दर्पादिविकार साढि ओर सनिधन दै, अर्थन्‌ वे बार वार्‌ इत्यन्न होते द आर नष्ट भी दोते ६. 
ेव्नानादिक गुण सादि दै परंतु मे कमी नष्ट नहीं होते, अतण्व वे सादि ओर अनिषन्‌ द, 

ˆ अथवा द्रव्य, षर, काठ ओर मावा आश्रय लेकर अद्ुके चार मेद होते ६. अद्धायुके आश्रयमे 
मवधारणसूप आयुका निरूपण दोता रै. आयुसंजञक जो कर्म हँ वे पुदलद्रव्यस्वरूप दी दै, अत. आघुःस्थिति 
द्रव्यस्थितिते भिन्न नीं है. । 

अथवा जीव जिसका अनुभव ठे रहा है रेस आषुक्ञक पुद्रर अत्मपसे नट होना दही मरण दै, अतः आयुः 
स्थितीमे परव्यस्थिती अयत भित्र नरी है, आटुकर्मं भी पुद्ल द्रव्य दै अतः अधुकी स्थितीके अद्धा कार-द्रन्य्‌ 
स्थिति ठेसा भी क सकते दै, आटुकर्म नष होना यह मरण है ठे उपर कह चुके दै. इस मरणे तीथकरोनि 
जिनवचनमे सतर प्रकार के रै, 

दीका--तीथेकरोने मरणके १७ प्रकार कटे है इतना कहनेसे भ अभिप्राय ध्यान्मे आता दै ‹जिन- 
वचने से अधिक शब्दकी क्या आवश्यकता थी १ 

उत्तर--आपकी दीका ठीक दै. जिन श्ब्दका यां गणुधर ेसा यथे समन्ना चाये, गाथाम च 
शब्द नहीं दै ते भी उसके विना भी सषुचया्थं माना जाता दै, यहां एसा स्वध करना चाहिय्‌, ताध्‌- 
करोनि मरणके सतर प्रकार कदे है, ओर गणधरेकि घचनमै अथौत्‌ उनके शचेत धमे भी मरणकं सतरह 
प्रकार के टै, अतः दोनेकि वचन प्रमाण अथोत्‌ दककि स्थान नी है । सतरह समरर्णोके नाम इस यकार 
&--१ आवीचिमरण २ तद्वमरण २ अवधिमरण ४ आदि अंत्ियमरण ५ बालमरण & प॑ंडितमरण ७ ओ- 
सण्णमरण ८ वालधीठत मरण ९ सश्चस्यमरण १० बल(कामरण ११ वोसद्मरण १२ विप्याणसमरण ९३ 
गिद्धपुदरमरण १४ भेक्तप्रत्याख्यान मरण १७ केबलिमरण । 


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१ आवीचिमरण--बीचि चब्दका अर्थ ' तरंग * एसा दौवा. तरं 
उदम आता, ह उसका भी यहां वीचि शव्द आचा उष्टेल करते हैः जसे नदी सयुर इ्यादिकोमे निरंतर लर 


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मुखाराषना || {& ट 19 
उदखलती दै वैस आयु कर्म यतिसमय उदये आता ₹ अतएव उसके उद्यको अव्वीचि कले दै. आयुका अनुभव || 
९४ शना ब जीवित दै. यह जीवित प्रति समयमे रहता ६. अलेक समया जीवित नष्ट दोना यद मरण ह, अत ग्रति | 
समयके मरणफो भी दां वीचि कहते ह आयुङे अनतरं मरण भी मत्तसमृय दता रहता दे अत" बह मरण ||; 
ई [3 | ५ [> [8 [> (म ‡ 
आबीचि मरण › पसे नाम्‌ प्रसिद्ध हे, यह आवीचि मरण भव्य जीवक प्रपि अनाद्‌ आंर सनिधन 8, (1 
भन्ये जब मोक्षमात्ि होती दै तव अद मरण नट हो जाता दै अत इसको सनिपन कते है, मोक पम्‌ | 0 
भन्यकत हमेशा मरण था इसकी पपेकषासे उसे अनादि भी कते है, यतः यह मरण भेन्योंकी अपेक्षासे अनादि ८ 
सनिधन है. 10 
ष दका--सिरोको दी मरण नदीं है उनके जन्म मरणकरा नाश दो चुका प्रतु सिदे व्यतिरिक्त श 


14|| जी्वोको हमेशा मरण है ही. सिदध जीवको भव्य भी नहीं कहना चाहिये । जिनफो भविष्य कालमें सिद्धत्व पर्याय 
ट कि व ¢ [प ० 


(2 चि दियं ] ६ 

\६॥ ओर सनिधन द देसा आगमम कहा दै, जिसने मन्यत्वपौय माप्त क्य था वही यह द्रव्य है एेसी अपेक्षासे 
८: मना मय अन निन है धेया कद सक्ते दै, अथच्‌ सिद्धोको भी भूतश नयक अक्षा भव्य 
ध .यभवपोफी अपेशसे यह आवीचि भरण अनादि अनिधन द, अथीत्‌ मत्रसिमय उनको आयुका उदय 
|| रदतादी रै, व अपेक्षासे षु ष्की अयेक्षासे यह मरण र कते ह, 

£ आयु कम क चार भेद्‌ दे उसमे यद्यपि मेक गतिमे आयुकी सचता रदी टै तो भी एकी आयुका 
{| उदय रहता ई अथच्‌ जिस गतिम यद्‌ माणी उत्सन्न दत्ता है उस्र गतिके अनुक आयुकादी उदय होता ६, 

६। 





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ष दौका--दो आयुष्यो की एक समयमे सत्ता रहती दै यद हम मानेत है परंतु एकदम दो ३ 
(५ होता दहै क्या! 
¢ उत्त जिस आयुकी मङृति ओर स्थिति अलुभवमें आ रदी दै उसके उपर इत्र 
रहते ह. अर्थात पू्ायृकी प्रकृति ओर स्थिती पूण अनुमवरमे आकर समाप्त होनेपर नंतर दरे 
8 होता दै, अतः एकदम दो आयु्योका उदय होता नरी. आपके भश्नका उत्तर अन्य भ्रकारसे भी दे ते है 
एक जीवको युगपत्‌ दो भव अथवा दो गपिंका संभव नहीं है. भव ओर्‌ गति की अप 
उदथ होता रहता ह, इनकी अपक्षाका उषटैषन कर आघुका कभी उद्य होता नी एसा नियम €. 
आघ कम की प्रकृती का उदय एक मवमे आता दै. इसरियि एक एक आयु की प्रकृति 
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| मसे नाश होनेसे आत्माको स्थित्यावीचिक मरण की प्राप्ति होती है, - 
ध अनुभवावीयिमरणका खरूपं पुद्ध्लोका जो रस अनुभवे आता है उसको अचुमब कहते रै. [|¢ 
|| यद अनुभव कर्पके परमाणुं छह मकारकी हानि रूपतासे तथा छह ्रकारकी ृद्धिस्पतासे हीन होता || 
|| योर्‌ बढता दै, मते रद हए इस अटुमवका तरगो$े समान मसे ना होवा दै. इको अजुमवावीचिक भरण || 
|| कते 


| मदेशावीचि मरणका स्वरूप -आयुसज्ञक ुद्रलोके परदेश जघन्य नियेकसे प्रारंभ करके एक दो तीन । 0; 
| त्यादि बृद्धिकमसे तरंगके समान नट दो जाते ह उसको पदेशावीचिकः मरण कहते दै. इस तरह आगरीचिकामरण |; 
१: ॥ का विमेचन हुआ । । 

२ तद्धवमरणका स्वरूप --पूैमवका नाश होकर उत्तर भवकी ग्रा होना वह तद्धवमरण ई यह मरण | 
1 इस जीवने अनंत चार आ या दै, यह मरण इस जीवको दरम नदी है, | 


| ओर सवमिभरिमरण येते दो भद्‌ है. सर्ाबधिमरणका स्वस्य ~र, स्थति, यदुभव ओर प्र सि आ ||. 
|| पपमानसमये सी उदये आती दै बेली ही आयु ए त्यादि पिविट वधक मदि उदयम्‌ आगतो उ 1 
‰; || सर्वाबधि मरण कहते है । | 
| ददावधिमरए्रका स्वरूप-जो आयु वैमानकाठे ्र्ृत्यादि विरि शकर जयी उद्यम्‌ आती है, वैसी || 
4: | दी आगु यदि. पिसी अशमे सदश होकर येगी ओर अरोक कारम -भविष्यकालमे उद्यमे आवेगी तो उसको (4; 
| देशावधिमृरणं कलते दै, अभिराय यह दै कि इ यमे अथवा पूर्यते सास्य जसम पाया जाता हे देषा ||; 
५८; | अधिपे वििष्ट अर्थात्‌ जिसमे पूर्ण साद्य मयादित हआ हं अथवा जसम इछ हिरम साच्स्यफी सर्यादा हे | 
ओर इ हिस्सेम नदीं एषे मरण फो अवाधेमरण कहते है | 
„__ _ आर्यतमरण--वर्तमानक्गरमे सा मरण जीवो भ्न हवा ह धसा अथात्‌ सच्शामरण अगे प्राप न (1 
दना उसको आयन्तमरण कदते है, था आदि शब्दस वतेमानकारीन प्रथम्‌ मरण रसा अर्थं समह्ञना चाहिये । | 





यूखोराषन 


2 ^ ^ ल 
(1) 4 10.11.400 


प 
र ९५९ 





यसे मरणका उत्तर मरणम नाय दोना उसको आथैतमरण कहते दै प्रकृति, स्थति, असुभव ओर प्रदेशमे युक्त 
रेते आयुका नार दोनेसे वतेमानकार्मं जसा मरण प्राप्त ह्ुजा है एसा दी सदश मरण आगे जीचको यदि प्राप्त 
न होगा तो उसको आद्यतमरण कहते ह । 
५ बालमरणुका स्वस्प- बालका-अर्थात्‌ अज्ञानी जीवका जो मरण उसको बाठमरण कहते दै. 
बरालजीवके पांच भेद ई. उनके नाम यथा-अन्यक्तबार) व्यवहारबार, ज्ञाना, द्दीनबार ओर चारित्रचारः. 
अन्यक्तबाल--अव्यक्त शब्दका अर्थं छोटा रुका एेसा सता दै, अर्थात्‌ जो धर्म, अर्थ, काम ओर मो- 
क्षका स्सूप जानता नदीं ओर इन चार पुरुपार्थोका आचरण करनेमे जिसका शरीर असमर्थं है एेसे बारुकको 
अग्यक्तबाल कहते है । 
व्यवहार बाल~ लोकव्यवहार, वेदका ज्ञान, शादज्ञान, जिसको नदीं है वद व्यवहार बार दं. 
दन मारवा भदान जिनको विर नही फेसे मिथ्यादृष्टि जीव दीन बालरहै 


मालाक्री जो मरण आता दै है बह अनिच्छाप्चृत्त मरण है. जीनकी इच्छा होते हृए भी जो मरण आत्ता है बह 
१३ 


= = ववद ^ 


न्वे 2 न. व. 6 की 0 0१ ^ 
= ग्रान एान यन एा ५ नक्वन 


^ ~> ~ ५०; 
करमर ८७ न्वण 


प 


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9 


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मूलाराघन) 
९८ 


अनिच्छा प्रवृत्त मरण है, 


| शशषा, भरयण्‌, धारणादि बद्धक यणोसे जो शुक्त हैँ उनको व्यवहार पंडित कहते द, 9; 
४ दन प॑ित--भैनको क्षायिक सम्यण्देन, अथवा ओंषदामिक सम्यग्दर्न वा क्षायोपदाभिक सम्यण्द- ||: 
धः यैन दैवे जीव दुन पंडित है 2; 
1: हानपडित-मत्यादि पांच गकारे सम्यग्ञानसे जो परित है उनको जञानपाऽत कहते ह । ५ 
| चास पदित--सामाथिकः छेदोपस्थापना, परिदारवि्य,  घ्मसांपराय, यथाख्यात रसे चाके 

^ ९ र 


' ||| _ , क्ञानप॑दिरतोका मरण भी उपयुक्त स्थानम दोता ह परंतु जिनो मन पर्यय पराप्त हुआ दै देस ज्ञानपंदित || 
नमा वानपतिना गक ा 
-प्सजमरणका वणन-रलनतरयमारभमे यिदार्‌ करनेवाले निर्ओका संघ जिसने टोढ दिया दै एसे मको 





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4) 


कवी 


क 2 न न 2 
छन्न 


(स कए ्ए न्क 


(2८ 0) श ग व~ 3 1. भ 
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अनसमन कहते ह भौर उसके मरणको अवसम्नमरण कहते है. अवसम शब्दसे पाशस्थ, सख्च्छद) $दील ओर संसक्त + 
$ 


रसे अट सुनि्ंका भी ग्रहण होता है, नका वणन- गि प . 
पार्थस्य, खच्छद्‌, कशी, संसक्त ओर अवसन्न ये पांच यकारे सुनि रलत्रयमारमे विहार करनेवारे 

्ुनि्ओंका त्याग करते दै, अथात्‌ खच्छ॑दसे चरते ईँ, ये इनि कद्धीम्‌ आसक्त दोते ह, रसम आसक्ति रखते ई. 

टु.खतते दसत ह, हमेशा खुलको चादते दै, कायो परिणत रौक्र आदारादि संज्ञा आधीन रहते ईह. 


# जिससे पाप उलन होता है एेसे इदासरोका अभ्थास कते है, ३ गुप्ति ५ समिति भौर ५ महाव्रत एसे तेरह 


भकार करियाम आलसी रहते दै, इनके परिणामो दमे संदे रा करता दै, आहारक पदाय आर वी, 
कमढल्वादिक उपकरणों नका चित्त आसक्त होता दै, निमित्त शास्र, मत्र शा, ओषध इनका कथन कर य 
उपजीविका कते ईै, गृहस्था वैयाद्रय करते दै, उत्सणुणोसे रदित दते दै, शुषि आर समितम्‌ इन की तत्परता 
नही रहती है. इनका मन संसारदुःखोसि भययुक्त होता नहीं दै. उत्तम क्षमादिक ददाधममिं ये प्रम नदीं करते द. 
इनके चास्त्रे दोप रुते है, रसे युनि्को अवसन्न कहते है, ये पुनि मरकर हजारों मवमे भ्रमण करे हये 
दुःखोको बारंबार मोगते दै. यादि पा्थखरूपसे चिरकर बिदार कर अंतमे उन्होने अपनी शद्वि की होगी तो चे 
ग्रशरमरणको प्राप्त होते दै, | 

जो सम्य्टषटि होकर संयमासेयम अथीत्‌ अणुव्रत धारण करता हे वह श्रावकं बाल पंडित कदा जाता ६. 
उसके मरण का नाम बाल पंडित मरण ठेसा है. यह श्रावक बार आर पंडितत्व एसे दोनों भावोसं युक्त शेनेस्‌ 
इसको माठ पंडित कटते दै, स्यू दिसादिक प॑च पार्पोका त्याग इसने किया है, तथा सम्यग्द्दीन का धारक मी 
दै, अतः यह चारित्र पंडित ओर दर्शन पंडित रै, परंतु दक्ष्म अरसंयमसे नित्त नही है, घर्म हिसादि पापका 
त्यागी न हनेसे इसमें यारत्व भी है अत इसको वारपंडित कना अन्वर्थ है, यह वा पठित म्रण गभजययाप्‌ 
रसे तिर्य॑च ओर मनुष्यो होता ६, देव ओर नारकी जीवम नहीं होता, क्योकि वे केवर दन पंडित दी दै. 
दंनपंडितमरण उपयुक्त तिच, मदुप्य, देव ओर नारकी जीव इनमें होता है. 

सश्स्यमरणके दो मेद्‌ ई क्योकि शस्ये द्रन्यशारय ओर भावशस्य एते दो भेद्‌ माने है. भिथ्यादर्न 
माया, निदान से वीन शस्योकी जिनसे उत्पत्ति दोती है एेसे कारणभूत कर्मको द्रव्यशट्य कहते दै, इनके 


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कण (ए मरणरणजपननपन्ए न 


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आशा 


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उदयसे जविमे जो मायास्म, निदानस्प्‌ आर भि्याल्स्म परिणाम शेते द चे भावस्य द हे. पः ध्वी) जल, बाघ, 
असि ओर वनस्पति इन पांच खावरोके मरणको द्रव्यशस्यमरण कहते ह. असंक्नि ेसे त्रस जीव भी इती 
मरणसे मरते रहै. 
शंका--द्रन्यशद्य सर्वं त्रस खाबर प्राणिआमं दे ही १ तो खावरोमें ही बह दै एसा आप कदते दह यद 
योग्य नदीं है, 
५ उतच्चर--वशरयसे रदित केवर द्रव्यशस्यकी अपेासे दमने ठेसा कदा दई. सम्यक्त्वमे दर्छनद्चस्यसे 
` || | अतिचार उत्यच होते दै, सम्य््वन खावर जीवो यर यिकलेन्द्रोमे नदी उततर दोता है, 

ध मेरेको भविष्यत्कारमें एसी एसी चस्तु मिरनी चादि रसा मनका संकद्प दोना उसको निदान कहते 
, यह असंक्निजीर्योमं मन न दोनेसे नदी दोता है. 
| : रल्नत्रयमार्गको दपण रगाना, मार्या नाश्च करना, मि भिव्यामा्का नि निरूपण करना, रलत्रयमाग॑मे चलने- 
£; || बारे लोरगोका धद्िभेद करना ये सव मिष्यदर्थनस्के प्रकार है. 
५0; निदानके ग्रस्त, अप्र्सत ओर भोगकृत एेसे तीन भेद दै. परिपूर्णं संयमकी आराधना करनेषी इच्छासे 
जन्मातरमं मेगको पुरपत्व प्रा हो, उत्तम छल, उत्तम च्ट गरि इत्यादि सामग्री ग्राप्र हो एसी मारथना करना 
्रशस्तनिदान दै, कपायसे प्रेरित होकर अगेके जन्मर्मे ुलरूपादि कोकी प्रार्थना करना अप्रशस्तनिदान रे, अथवा 
कोधांध होकर अपने शरूको भ उत्तर , भवमे मार्‌ सदं एेसौ इच्छा रखना से बिष्टषनीने उग्रसेन राजाका नाञ्च 

करनेकी इच्छा क थी, „बह चरिष्टुनि मरकर कस हुवा था उसने अपने पिताकरा शञ्य छीन सिया था आर 
{| उसको कारागृहे केद्‌ किया था, यद अग्रशस्तनिदानका उदादरण ह. 

भोग रि निदान--इस लोकम तथा पररोकरमे-स्वमादिकमे मेको अच्छे २ भोग इस वरताचरणसे मिलने 
चाय एेसा मनम संकर करना बह भोगनिदान दै. यह मोगनिदान असंयतसुम्यग्टषटि च संयतासयत अथीव्‌ 
श्रावकको होता है, ये जीव भोगनिदानसे मरते द, इसको भोगनिदान मरण कहते है, 
मायारास्यमरण- पाशस्थ, इरः, संसक्त वरे श्र यनीक स्पसे चिराल तक विददार करके जी 

मनि मरणसमयमं भी दोरपोकी आलोचना चिये धिना दी मरते दै उनका वह्‌ मरण मायाशरयमरण समञ्चना 








अवाः 


-मूलाराषना 
१०९१ 


१ 2 0 0 0. 
णि नीनए पनज ए 


८ 


(1 


हिय, यह मायाराव्यमरण पुनि, श्रावक, ओर असंयतसम्यग्टष्टिके राप होता दै. ॥ 
५ ४ व मरण --देववेदनादिक नित्यनैमिक्तक छय। करनेमे अलसी-प्रमादुक्त' विनय, 
्यादरत्य वरे कायेमिं आद्रभाव न रखनेव्राला, व्रत, समिति ओर युक्ति इनके पालने अपनी शक्ति छिपान 
याला, धर्मके स्सूपका विचार करके गमय मने! नद्‌ तेनेवाला, ओर ध्यान, नमस्कारादिसे दर्‌ भागनबाला 
से मुनीके मरणके बलाकामरण कहत दै. उपयुक्त कयम अयुक्त रहनेवलि सुनि इस मरणसे मरते ई. 
सम्यक्त्वंडित, ज्ञानर्षटित, चारितरिपडित एसे लोक स मरणसे सरते दै. इनके (सिवाय अन्य भी इस मरणम 
मरते ह, अयसनमरण ओर सशरयमरणका स्वस्प पीठे कट चुके द उसंम नियमते बलाय मरण होवा है, 
ओसटमरण-- जिसने शरल्यरदित ओर संसार दुःखत भयभीत होकर चिरकाल रत्नत्रयका पालन 
किया है, जिसने समाधिमरणके षयि संस्तरका आश्रय किया है, एसा नि यदि छयभोपयोगको छोड दे तो 
श्चभभाव उसमे नदीं रह सकेगा उसको अतैध्यान ओर रीद्रघ्यान धेर लेगा. एसी अवस्थार्मे मुनक यदि 
मरण होगा तो उसको वसटमरण कहते है. इस मरणके १ दंदियवसटमरण २ वेदनावसद्मरणः, र कायस 
मरण ४ नोकपायवसट्मरण टेसे चार भेद दै. ॥ ॥ 
ईदियवसद्मरण-स्प्ीनादिक पांच दियो स्प, रस, गथ, यथ, शव्द एसे पांच विपय दै. इन 
पिपरयोकी अपेकषसे इस मरणके पांच भेद दते दै. जसे -्पदीनद्वियवसद्मरण,  रसरनपरियवसदटमरण इत्यादि, देव, 
मलुप्य, तिर्थच, ओर अजीव पदार्थ इनके दवारा किये गेये तत, वितत, घन, ओर सुपिरदवदूमि -यदि ये मनोहर 
दो तो उने आसक्त होकर, अमनोदर हो तो उन दवेषयुक्त होकर जो मरण होता दै उसको श्दरियवसदटमरण 
कहते है, अन्न, पान, खाय ओर ठ्य एेसे चार प्रकारके सुंदर ओर असुद्र आहारे करमसे आसक्त आ।र , धप 
युक्त होकर मरना यह रसरनद्रिय वसदमरण है, पूर्यक्त दैव, मलुष्य, तियच ओर अजीव पदाथ इनके गधम्‌ 
आसक्त था देपयुक्त दकेर मरना यह धरणेद्रियवसदमरण है. उपयुक्तपदाथोकि स्पर्म या आर्तम आसक्त अथव 
द्षयुक्त दोकर मरना नेत्रद्रिय वषट मरण दै. इनदी पदाथकि सपशमिं आसक्त या द्विष्ट होक मरना स्पशैमद्रिय 
वसद मरण दै. इन सव॒ मरणोका दंदरियानिंद्विय वस मरण से एक नामसे रेख करते ह. इ 
वेदनावसट मरण-इस मरणके सतवेदनावशावं मरण ओर अपविदनावशषतं मरण रसे दो भेद ह. 


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{|| अथवा उभयत्र उत्यन्न हुवा जो क्रोध मरणको कारण रो जाता ह वृह कोधर्पाववातं मरण दे 


६ मानवा मरण द. 


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शारीरिकः सीर मानसिक बेदनाते | पीठित दोर अर्थात्‌ उनमें एकाग्रचित्त होकर, दु. खसे मृदिव होकर जो मरण 
होता हे वह असातयेदनावशते भरण ह. शारीरिक जीर मानसिक सुखे नुस््त दाकर ओ आव ध्यान 


|| मरण दोता हे वद सातवेदनावक्षाते मरण द. 


कपायवश्नाते मग्ण--कपायके चार भेद दोनेसे दस मरणके भी चार भद दोतदै. खत्‌ म, व 


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१ मानवश्ातं मरण--इसवेः आट भेद द, इ, स्प, वट, शासुज्ञान, दर्यः ठाम, गरता-दृद्धि ब त 
¡|| इनसे उत्पन्न हए अभिमानके नदे मरण रोना मानवाते मरण ई. १ विख्यात, विशाल अर 
|| उत्कर्मको भाप हए रमे उत्पन्न वा टं एते अभिमानमे जो मरण दता द वह. कमाय मरण ई. 


२ मेरी पांयो इ ड्रिया निर्व्यग हं ष) भेरा शरीर सपण अवयगोसं युक्त द, म तजखी ट नवीन चौवनमे 
मेरा शरीर युक्त ई, भेरा सदयं ममल्त लोको थत करणको दर केता ई एेसी भावनामे जो मरण होता ट बद्‌ स्प- 
३ दृध अर प्तौ भी उखाटनेमे समथ ह, बेट वदे योद्धा भर आश्वयमे रहते ह, बहुतमे 


[५ 


मित्र भी मरे सदाय प्रदान कते ई. एसा खफरीय चलका अभिमान करते करते मरण दोना बह वटाभिमान- 


भ बडे परिवारका मारिक ट यदुत्‌ रोरगोपर मेरी दुकमत चरन्ती ६ एसे एवर्यके मानसे उन्मत्त होकर 


|| जो मरण दतां द चहं देव्थयमानव्चा्तं मरण ६. 


५५ मेने लोक व्यदार, येद, नेक मत इनवः सिन्त शासरोंफा अप्यवन क्या ह एम ाचन्नानके 
अभिमानमे चूर दोकर मरण करना यह श्रुतमानवदशास मरण द 

६ मेरी उदधि वी ह, स विपरि बिना रुफायटये मेय यती द पेम सुद्धयभिमानके वद्यमें आकरं 
मरण दोना चह यज्ञामानयसाते म्रण दै. 

७ व्यापारम भेको दमेणा काभदी दोता ई एसा ऊाभके अभिमानमे मत्त होकर जो मरण होता है बह 
लाभमानवदात मरण हे. < भे तप करता हः भेरे समान तप करनेवाला कोई नदी ई रेमे अभिमानमे आकर 


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जो मरण होता ई वद तपोमानवशातं मरण दै, ॥ । 

मायाके पांच श्रकार दै, निति, उपधि, घाति प्रयोग, थणिभि ओर  प्रातकंचन. ९ _धनके वियम्‌ 
अथवा किसी काके धपयमें जिसको अभिकापा उत्यन्न हुईं दै एेसे मयुप्यका जो एसानेका चातु उसको निति 
कहते ह २ अच्छे प्रिणामको ठककर धर्मके निमित्तस चोरी चरे दोपे प्रति करना बह उपथिसंज्ञक माया दै. 
३ धनदे पिपयमे असत्य बोठना, अपने हाथमे फिसीने रखनेकेरिये द्रव्य दिया हे तो उसका इछ ॒दिस्सा दरण 
करना, दूषण रगना, अथवा ग्र्॑सा करना वह सातैम्योग माया दै, ४ हीनाधिक कौमतकीौ सदर वस्तुं जपसम्‌ 
मिलान, तोक ओर मापके सेर पसेरी वैरद साधन पदार्थं कम जादा रखकर ठेन देन्‌ करना, सचे ओर बरे पदाथ 
आपसे मिलाना. यह सच प्रणिधि माया कहते है. ५ आलोचना करते समय अपने दोप छिपाना यह प्रतिंचन 
माया है, रेस मायके प्रकार करते दए जो मरण होता है उसको मायावशार्तमरण कहते दै. 

उपकरण पिंही, कमदलु आदिक, भक्तपान-आहारके ओर पीनेफे पदार्थ, शरीर, निवासस्थान इत्यादि- 
कोम इच्छा-ममत्य रखते हृए जो मरण होता दै वह रोभवदातंमरण कटते दै. ए 

हास्य, रति, अरति, शोक, मय, जुगुप्सा, सवेद, पुरुपयेद नपुंसकवेद इनसे जिसकी बुद्धि मूढ हो गरं 
ह एसे मलुप्यका जो मरण वह नोकमायवशातं मरण है. 

जो प्राणी वदार्वमरण को प्राप होते है वे मलुप्य ओर तिथचोमे जन्म धारण करते दै. तथा असुर, 
कँदर्पजातिके देव, किप देव इनमे वशार्पमरणंस मिथ्यादृष्टि जीव उत्पन्न दते दै. इनके इस मरणको बालमरणम्‌ 
अन्तशूत फर सकते दै. ददनं पंडित भी, विरत सम्यण्दषटि, ओर संयतासंयत जीव भी वदातमरणको प्राज्न हते 
हे. उनका यह मरण वापंडित मरण अथवा दर्चन पंडित मरण समञ्चना चाहिये. 

विप्राणसमरण योर गृण देसे नाम जिनके द फेस दो मरणोका शास्मि निषथ नशं है ओर इनकी 
अनुज्ञा भी नदीं है. 

दष्कालर्मे, अथवा दुष्य एेसे जगरर्म, परवैकारके शच्रका मय उपस्थित हुवा हो ठेसे समयमे, दुष्ट 
राजसे भीति उत्पन्न हुई दो, चोरसे भय उत्पन्न दुवा दो, तियैचका उपसग हो रहा हो, एकाकी स्वयं सहन 
करनेमे असमर्थं होनेसे, त्रम्दवतका नाद बरैरेके हयार चास्मे दोप कगनेका प्रसंग आया हो तो संसारमीर, 


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पासि दण्नेवाला, कका उद्य स्प समय उपस्थित ट हवा रेता जाननुर उसको सदन २ करनेमं अमपर्थ देता ह्मे 
सैकटोसे पार पठने का उपाय उ्तको। नदी दीखता है तो भी पापकायसे वद इस्ता 2, आमाका पात करनेवलि 
मररणोसे भयगुक्त दोता ह. उपर्ुक्त करण उपस्थित सो जनिपर अव मेण इश्चट दोगा क्य एसा यह मनम 
विचार करता इ-यदि भ इस उपसरे; भयसे पीटित हो जाऊं तो मेर सेयम्‌ नष्‌ दोणा ओर मेरा मम्यम्टर्न भी 
नट होगा. इस उपसर्गसे जो वेदना दो रदी दे बद सहन करते समव परिणार्ममि सेक्टश् दोगा दी. अव्र मेप 
रलव्रयाराधना नट होमी-न द्किमी एसा जवर उसको निध्वथ दता दै उष समय निप्कपट्‌ दोकर. चारित्र जर 
दीने बिशद्धता धारण क्र धथुकत होता दै, जञानका सहाय लेकर ॒निदानरदित्‌ दत ई" अरहन्तकेः समीप 
आलोचना करक विद्य रोता ६. निर्भर ठेश्याथारी बह पुरुप अपने श्सेष्टासका निरोध कप्ता हवा प्राण त्याग 
करता है. एसे मरणको विग्राणस मरण कहते दै. व 

उपरक्त कारण उपसित होनेपर शश्ग्रहण करके जो यणल्याम किया जाता द बह गृद्रशष् 
मरण दै, 
; । इस तरद मरणके जितने विकल्प संमनीय थे ये कटै. एसे मरणेति गरणी प्राणत्याग कते ह. 

्ायोपगमन मरण, इईगिनी मरण, ओर भक्तमत्याख्यान मरण रेस तीन मरणदी उत्तम द, पं कालीन 
महापुरपोनं इनकी दी प्रहृत चलायी दै, हमने स्तपसे अगमका अनुक्तरण कप्के सतरा प्रकारके मरणक्ा विवेचन 
कियाद, 


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प्तेषु सप्तदशसु पच मरणानि दृद सक्षेपत निरूपावेप्यामीति प्रतिएनिन र्ता । कानि तानि पच 





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मरणानि शव्याक्ंकाया व गाधामाद-- 
। पंडिदमरणं पडिदयं बाटपंडिदं चैव ॥ 
0 वारमरण चरउत्थ पचमयं वाख्यारं च ॥ २६ ॥ 
1 पंडितं पडितादिस्थं पटितं वारपडितम्‌ ॥ 


चतुर्थे मरणं वारं वावा च पचमम्‌ ॥ २९ ॥ 


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पडिदम॒रणं भणिद्‌ चदुव्विघ शति ्ि म ॥ # 

शति वदता चतु श्रकाराः पंडिता उपद्दिता. । तेषा मध्ये अतिशयिते पाडित्यं यस्य क्षानदरशनचास्िघु स ॒||{ 
पंडितपडित इत्युच्यते  पतत्पाडित्यप्रकर्परदित पांडित्यं यस्य स पडित उच्यते । व्याख्याते बाल्यं पाटिल च यस्य ५४ 
स भवति वालपडित तस्य मरण वाखपेडितमरण । यस्मिन्न संभवति पाडित्यं चुण्णौमप्येक जसो वालः। सवतो न्यूनो || 
वाख्वालः तस्य मरण बाटवारमरण । % 
म भवपयायविनाशः । निरक्िगम्यताचयेपा लक्षणस्यावचनम्‌ । तथा दि- १ 
छते सम्मते वा णाणे चरण य प॑डिद्‌ जम्दा | 

पंडिद्मरणं भणिद चदुव्विं न्विदं जए ॥ #; 

एषंविधचतुर्विधपंडित्ताना मध्ये अतिङायित पाडित्य यस्य जानदशैनचारित्रवपस्पु स पंडित" संपूणेकायिकक्ञा- | 
नादिरित्ययैः । ततोऽन्यः पंडित स पंडा दि. रतत्रयपरिणता बुद्धिः संजाता अस्थेति पंडितः । जत एव [| 
इत्युच्यते । सगय सत्यपि  सवैथा म) । अत एव रष्याधिवौकवार इत्युच्यते स ॥ 
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9: तत्रा्यानि चीणि मरणानि सुगतिगमननियतनिमित्तत्त्वाञ्जिना स्तुवन्ति नेतरद््वयं वद्विपरीत्वात्‌ 1 तथा ४. 
|| चन्यस्मादानीय सूत्रे पठन्ति-- १ 
१ पंडिदपंदिद्मरणं च पंडिदं वारपंडिदं चेव ॥ 


एदाणि तरिण्णि मरणाणि जिणा णिच पससंवि ॥ 








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५ सत प्रकारके मरणामेसे पांच भकारे मरक संकपसे सँ वर्णन करूंगा एेसी भंथकारने प्रतिज्ञा की दै 
|| वे पांच मरण कौनसे द १ एेसी दका दोनेपर मरणका नाम निर्दे करनेके किये आचार्यं गाथा कदते दै-- 

(१ ६ टिन्दी अर्थ-पदितपंदितमरण, पडितमरण, बालपटितमरण, वालमरण ओर बावामरण एसे पाच 
| मरण, । 
शः विरोपार्थ -^ भवपयौय्ररयो मरणं , मलुप्यादेभवके पययका नाश दोना बह मरण दै देसा यदि 
|| सरणा लक्षण करोगे ठो भवपयोय अनेक प्रकारके है उनका नाश होना यह भी मरण है ठेसा मानना पदेगा. 
|| पयार्योका नारा ओर. मरण इसमें इछ विरता अजुभवमे न आवेभी. यदि भवपर्याय अनेक है ओर उन सचका दी 
| नाश होना मरण माना जाता है अतः पयौयका नाश ओर सरण इनमें अंतर है ेसा कोगे तो भलुप्यमे मरणके 
%: | पच भकारोकी संभावना न होगी, कृयकि एक जीवका भी भवपयोय अनैतरूपकरा होता है, नाना जीरवोकी अपेक्षा 
२५५ से तो भरणके पांच 1 # 

६ माणिनः प्राम्यो विचोगो मरणं ' आणोस प्राणीका अलग होना मरण है ठेसा यादि लक्ष्ण करोर 

|| समान्यकी अयेक्षासे एकदी मरण सिद्ध होगा. म॒रणके पांच प्रकार सिद्ध न होगे. 0 
| मानोगे तो मरणे दश भद्‌ होगे, उदयमाघकर्मषद्र्गलनं मरणं उद्यमे आये हुए कर्मपुद्ररका खिरना वह मरण 
| ई एेसा यदि करोगे तो कमल मतिसमयभे खिरते द अत" मरणम पांच मकार सिद्ध नहीं हते ई. गणभेदी 
४ क 1 प्रकार होते ह अतः गुणो सेधसे मरणके पांच भेद हम मानते है एसा यदि कदोगे तो 





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५ पंहितपंडित मरण अश्चसतम दै, प॑टितमरण श्र्रततर, .बाखयंदित मरण ईपत्मखस-धोडास ग्रस्त 
है, बारमरण ओर बाखबाटमरण क्रमसे अविरिष्ट ओर अवधिष्ट तर दै ” एसी व्याख्या करते दै, परंतु पंटित 


शव्द ग्रस्त इस अर्थम किस प्रकरणमे प्रयुक्त किया दुमा उन्होने देला है १ जिससे वे ेसा व्याख्यान करते है, 
दुसरे आममका आश्रय न लेकर यह व्याख्यान किया गया है. 

आगमान्तरमे व्यवहार, सम्य्द्न, श्ञान ओर चारित्र इनमे जो पंडित टै रसे जीर्वोकरा जो मरण वह 
पंडितमरण दै एेसा कटा है. उसके चार प्रकार दै. जंसे-व्यवहारपंडित मरण, सम्यक्तवपंटितमरण, क्ञानपंडित मरणः 
ओर चासत्रिपंडित श्ण, व्यवहारादिक अथोभ आगमान्वरमं पंडित इ्द का प्रथोग करिया हुवा रै, परंतु परशस्तम 
पर्स्ततर वगर अर्थम रयोग नही देखा गया है. 

ञान, दर्शन ओर चारितरमे मिनका त्यत पांदित् दै बे पंडितपंडित्‌ दै. इस तरहका पांडित्यका सक 
ज्ञानादिकोभे जिनका नदीं है अर्थीत्‌ जिनमें ज्ञानादि विषयक पांदित्य अर्प है वे पंटित है, जिसका विवेचन पूर्वमे 
कर चुके दै. यादय ओर पांदित्य जिनमे ई वे बालपंटिति है, जिनमे चार प्रकारे पांटित्योमेसे एक भी 
पांटिस्य नदीं ई बे वारु दै. तथा सवंसे जघन्य जो वह चारुयारु दै, इन सवके मरणाकी क्रमसे पंडितपंहित 
मरण, पंडितमरण, वारपंडित भरण, वालमरण ओर बालधाल मरण एसे नाम दै. 





पडिदपडिदमरणे खीणकसाया मरति केवलिणो ॥ 
विरदाविरदा जीवा मरति तदियेण मरणण.॥ २७ ॥ 
विज्ञातद्यमयोगानां तच पंडितपंडितसम्‌ ॥ 
देकसयततजीवानां मरणं वाटपंडितम्‌ ॥ ३० ॥ 


विजयोदया-पडिदषडिदमरणे खीणकसाया मरति केवघिणो । सामान्यस्तेर्विेपश्छति, कर्मतया निर्देष्टं 1 


पडितपडितमरणमिति । यथा गोपोप पुष्ट । सीणकसाया फपन्ति रदिसन्ति आत्मानमिति कपाया । कपाय- 
दव्देन वनस्पतीना त्वकप्रमूरष्टदरसर उच्यते ! स यथा वल्नादीना व्ण॑मन्यथा सपादयति एव॒ जीचस्य क्षमा 








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११ व 
पना! वि | (वः 
१ प्राय. ! केबजक्ानस् मोदादिकमैनिमूलनमूलस्वेन केवठिनः ्ीणकयायत्वविशपणस्य निष्फडलात्‌ । 1 त मरण- |{ 
१०९ ६ { करणाव श्षीणकपाया इत्यनेन अयोगा निद्चीयते सयोगकेवखिना मरणारससमवात्‌ । क्षीणा विग्िपं मताः कपाया येभ्यस्ते १६ १ 
॥ £ क्षीणकपायवेदनीयाः तत्वादेव च यिन्टवन्मूढभावकपायाः सरति रन्यम्राणासत्यजमन्वि । सिद्धानामपि सत्ताचैतन्य | { 
१ वोधादिस्वमावप्राणधारणत्वटक्षणजीवस्वमावाधिकेपात्‌ । तथा चोक्तम्‌-- । £ } 
११ जदं जीवसद्दावो णत्थि अभावो वि सव्व तस्स ॥ १1 
ष वे होन्ति भिण्णदेदा सिद्धा वविगोचरमदीदा ॥ {4 
1 केवलिमो करणादिसदायकनिरयेश्वतया युगपननिभेषदरन्यपयौयसाभात्करणसमर्थ ज्ञानं येषा नित्यमस १ { 
६ ते केविन. । विरदाविरदा एकािन्नेव समये स्थूलासपराणातिातादेत्याडत्ता सूकष्माच्चान्यावृत्ताः श्रावकाः इत्यथैः । | 
जीवा, पुरुषा. न प्रधानं 1 साख्या दि परथानस्य मरणमिच्छन्ति । तदियेण वारपंडितेन । (८ 
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7 -2,) 


जिनके मरणको पंडितपडित मरण ेसी संज्ञा वे पंडितपंटित कोन दै, ? अथौत्‌ पंठित्पटितं किनकी 
कहते है रेते श्रश्रका उत्तर आचार्य देते दै- 

ददी अरथ--पंठितरयटित मरण, प॑डितमरण ओर बारपंदित मरण इन तीन मरणो जिद देवे 
निल परयसा काते रै, ्ीणकपाय केवली भगवान्‌ पंडितपैडित मरणसे मरते दै. अधौत्‌ केवरीके मरणकी पंडित 
प॑टित रेसी संज्ञा है, धिरताविरत जीवे मरणको बारुपंठित मरण एसा नाम है. 

गाधार्थ--' पंठितपैडितमरण खीणकसाया मरति केवरिणो ' इस वाक्यमे ‹ मरति ' इस सामान्य 
मरणस्य क्रियाका । पंटितवटितमरण › यह विरेप मरण कर्मुयसे प्रतिपादन किया है, जेस ‹ मोपोपं पष्ट” अथीत्‌ 
वैर जैसा पट रहता है वेसा यह आदमी पु दै जे यदं पुणटिसामन्यक। गोपो यह कमसरीखा विपण दं उसी 
तरह सामान्य मरणका दी पंडितपंडितमरण यह एक विरेय प्रकार समञ्चना चाहिय, 

तो आत्माका थात करते ह वे कषाय है, अतएव कयायशब्द की निरुक्ति आचाय ‹ कपन्ति संति 
आत्मानमिति कायाः › देसी दते दै. अथवा बृषी छाल, मू, पत्ते ओर फर्लोका जो रस निकलता दै 


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कहते ई, बह रस जसा वद्धादिकौका वध अन्यथा करता दे, उसी त्‌ 
जीये उत्तम क्षमा, विनय, सररपना, ओर निस्पृहपनाको अन्यथा करे 
, ||| करते दै, अतः इन करोधादिकोका ‹ कपाय ' यद नाम अन्वर्थक दै 


| शल्दका अथै तयेवली रेसा समदना योग्य नदी दै, 


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वरिरतायिरत जीवोकि मरणको बारधटित मरण फटे दै, भ्रावक्‌ स्थूल दसादि पांच पापेसि विरक्त रहते 
हं अतः उनको विरत कहते है, घ्रष्मपापोंका वे त्याग नहीं कर सकते ह॑ इसरियि उनको अविरत भी क 
सक्ते रै. 

दौका--यदि श्रावकोंको आप ।विरत' एेसा कहना चाहते हो तो उनको अविरत मत कटो, यदि अविरत 
करोगे तो विरत कहना अुचित दै ! 

उत्तर--बिरतत्र ओर अविरतत्व्मे गरिवक्षमेदसे पिरोष नरी. जेते एकदी पदारथको ्रनपये्षसि ओर 


है, विशेपमरणपेकषासे तृतीयता मानोगे तो भूतकारमे अरनैतमरण हौ खुके ह ओर भविप्यत्कारमें भी बहुत होगे 
अतः विकेपमरणपिक्षासे भी तृतीयता सिद्ध नदी होती. 

उत्तर-दररमे कटे हए कमकी अवेक्षते मरणकी तृतीयता ग्रहण करनी चाये, अथात्‌ पहिला मरण 
पटितवैटितमरण, दुसरे मरणको पैदितमरण कहते दै, ओर तिसरा मरण बारपंडित इस नामका है, 








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अथ के पडितपेडिता येपां मरणं पडितपडितमरणं दति भण्यते इत्यारेकायामाद-- 
पाडिदपोडिद्मरणं च पंडिद्‌ं बार्पंडिदं चेव ॥ 
तिण्णि म्रणाणि जिणा णिच पसंसंति ॥ २८ ॥ 


(8 | गाश्वासः 





शका--विरताविर्तपरिणामविशेषसे दी श्रावक जीव है एसा सममे अताहैतो भी दिरदाविरदा ५६ 
जीवा ' इसमे जीवशब्दका ग्रहण व्यथं दै. उत्तर जीव शब्द्‌ गाधा दिया दै उसका उदेदा ,मतांतर॒ निराकरण || | 
करये रि लिये दै. सांख्य मरण प्रकृतिका प दे एसा समहषते दै. बे पुरुपको-आत्माको सर्थथा नित्य समञ्ञते ||; 

8 योग्य नीं दे, आत्मा उत्पाद, व्यय ओर धौव्य इन तीन खरूपोंसे युक्त है अतः वह सर्वथा 
£| निलय 
५ दोका-पंटितपंदित मरणके अनैतर पंडितमरणका वर्णन करना योग्य था परंतु बह उद्टंषन कर तिसरे || 
|| मरणके सामी आपने कर्यो बताये १ मका उद्टेषन केम आपका क्या छ्‌ है! (2 
६ उततर-- उतकृ पंडितत्व ओर्‌ जन्य पंडितत्व इनके वीचमे जो दै सो म्यम प॑दितत्व दै सा | 
| दिखानेके अभिग्रायसे उप्यक्त कथन दै, अथौत्‌ उत्तम्‌ पंडितत्व ओर जघन्य ॒पंडितत्वके मिवेचनसे मध्यम || 
|| पितत विना कटे सिद्ध दोता दै. अथवा पंडितमरणे विषयमे ग्र॑थकार व बहुत विसतारयुक्त छिखनेवाले दै. शूष | 
£| बाजत ५ अलग रखते है ओर थोटासा विवेचन करनेकी इच्छासे बारपंडितत्वका प्रथम्‌ आवचार्यने - || 
उद्टेख त 





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११३ |: 


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कतिविध पंडितमरणं क स्वामिक वा त्यरेकाया यं गाथा-- 
पायोपगमणमरणं भत्तपद्ण्णा य इगिणी चेव ॥ 


न द्र 
‡ । ग | 
६ तिविष्ट भरिविध विथकार । पडितमृरण कस्य तद्वति ¶ साधु साधो जधुचचारिस्स यथा येन पकारेण उक्त शते 
तथा चरितु शील यस्य साधोस्तस्येति याचत्‌ । सद्ष्चार' सं प्व जन सयतोऽसयतश्च खोक साधुरव्दवाच्य", एति 
सयतपस्म्िदाध यथोक्तचारित्वविदपणं रुतम्‌ ॥ 








्र्मस्यतरपंडितमरणस्य भदोन्भरूपयन्स्वामिनं निरूपयति 1 
मृारा-पाऽवगमणमरणं-पादाम्याञुपगमनं दौकनं संवानिगेय योग्यदेकषास्याश्रयणं । तेन अ्वर्वितं भरणं पादोपग- 
४ मनमररण स्वपरेयाटृत्यनिरपेक्ष" प्राणत्याग उच्यते खूडिवश्यात्‌ । यदा पाडग्गगमणमरणं इति पारस्वदा प्रायोग्यस्य 
# क + (1 । 


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[निन प (2 2 2. १53 > 
ॐ 





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केचित्‌ । यत्पुनः स्ववैयावृ्तिसापेश्षमेन । जडत्तचारिस्स ! येन प्रकारेण छक्त शरुते तेन रितु शीरं यस्य॒ तस्य यथोक्त (/ 
चारिणः संयतस्येत्यये* ] १ 








स भेकी गाषा ||| 
| दता ट 
॥ दी अरथ--आगममे जिस भका्ते चारिका वर्णन है वैसा खयं आचरण करना यह जिनका || 
||| शीर दै अथीत्‌ आगमसे अविरुद्‌ चारित्र जो धारण करते दै एसे शनिराजकन पंदितमरण पादोपगमनमरण, भक्त ||. 
४ १५७ ५) यौर होगी मरण एसे तीन भेदयुक्त दै. अथोत्‌ निरतिचार शनिराजके मरणके भेद उपयुक्त गाथाम (१ 
© कट्‌ ५ 








गूटारापना 
११५ 


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अथवा गाथाम ' पाओग्गगमणमरणं ' एेसा भी पार है, उसका ेसा आभेप्राय है-भवका जत करने 
लायक रसे सस्थान ओर संहननको प्रयोग्य कहते है, रेते संहनन ओर संस्थान की प्राप्ति दोना यह्‌ प्रायोग्य 
गमन ह, अथीत्‌ बिरिषट संहनन ओर विशिष्ट संस्थानवाला दी प्रायोग्यगमन मरणका अभीकार करता है. 

भक्तम्तिङ्ञामरण--भक्त रव्दका अर्थं आदार दे ओर प्रतिज्ञा शब्दका अर्थं त्याग होता है अथीत्‌ 
आदारका त्याग कर मरण करना वह भक्तग्रतिज्ञामरण दै. यह॒ मरण स्वपरेयादृत्य की अपेक्षसे होता है. 
अथौ स मरणमे सद्ेलनाधारक कौ परिचारक यनि शशरपा कले दै तथा वह भी अपनी शशरषा करता ई. 
यद्यपि आदारका त्याग हगिनीमरण ओर प्रायोग्यगमन मरणम भी होता दै ठो भी इसको दी स्ढीसे भक्तमतिक्ञा 
कहते टै, अथात्‌ स्वपर अपेक्षा करके जो मरण पि रि . रसे विरिष्ट 
मरण को दी भक्तम्रतिज्ञा कहते है, 

हगिनी मरण स्वाभिप्रायको ईगित कहते है, अपने अभिग्रायते युक्त हकर स्वयं दी स्वतः कौ _दश्रया 
कुर्‌ जो सरण शिया जाता ६. वह इंगिनी मरण दै. पस्चिारक्‌ यनिकी शपा इसे धपक यूनि चाहते नहीं ६. 

~ यथोक्त चारित्िका पालन केवले यक रेमे तीन मरण कट है इन मरणाकी समान्य रीतीसे 
पंडित मरण कहते है. 








मिच्छादिद्धी य पुणो पचमए वाख्वाटम्मि ॥ ३० ॥ 


-- सदाचारसे भ्वतैनेवाले सव संयत अथवा असंयत जगते साघु कदे जाते है. परु यष्टा सुनिर्ओका 
ही म्रदण होवे इस ददुस “ जधुत्तचारिस्स "यह साधुफा विशपण करके यथोक्त चारित्र पारनेवाठे युनिका दी अ्रदण 
कियाद 


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११५ 


मूलारसा--अआधरदसम्मादद्री इति । 
नो ईव्यिघु विरदो णो जीवे यावरे वसे वापि ॥ 
जो सदददि जिणुत् सम्मा अविरदो सो ॥ १॥ 


वः 


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भिच्छन्तं वदतो जीवो विवरीयद॑सणो दोदि ॥ 
भ य धम्मं रोचेदि हु महुर खु रसं जदा जारिदो ॥ २॥ 
बारमरण आरे बाल्वालमरणके स्वामी कोन होते है यह विषय 


एटंदी अर्थ--अविरत सम्यग्दटि जीव चौथे बालमरणसे भरते # = द्‌ च ॥; 
ालमरण _ कते ह, ओर मिथ्या जीव जिस मरणसे मरते ह व 1 # 











मूलाराषना आश्वास 


११७ 


अथकारने अप्रस्तुत विपयका विवेचन किया नही दै, बीच जो मरणे विकल्यकः विवेचन क्रिया दै चह 
अप्रस्तुत नकी है, आराधनाके साथ मरणका संय दै. अतएव इस शाम उनका उषटेख आचायको करना पडा 
हे, आराधना आराधकके विना होती नही, आराधक आराधनाका खामी है, अतः उसका उष्छेख करना न्यायत्रास 
ही है, इस तरह आघा्थने शकापरिदार किया दै, 


अतएव प्रस्तुता प्राथमिकी ददौनासधना भाचषे- | 
तत्योवसमियसमत्तखदयं खवोवसामेय वा ॥ 
आराहंतस्स भवे सम्मत्ताराहणा पठमा ॥ ३१९ ॥ 


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= £ भ (1 ५५ (9 ~ १ 5-4 < क 23 श ८4 93 - (3 ५) (95 8 ऋ -- 
०० ~>1 छ -3 क > 2 ८ र्ठ ई (20 


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१ #) ङ 
उत तद्विशेष ति तेन तत्सदेदनिदृत्ति क्रियते । तत्थ तेषु सम्यक्व्वेधु 1 उवसमियसम्मत्त अनंताचुवंधिक्रोघमानमाया 
रोमाना सम्यक्त्वमिथ्यात्वसस्यद्मिध्यात्वाना च सत्तानाञुपशमादुपजातं तखश्रद्धानं जोपश्छमिक सम्यक्त्वं । | {& 


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३, इ 
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(२ त्ग्ररृतीना पजातवस्तुयाथात्स्यगोचणा शद्धा यिकं ददन । ताखमिव कासां चिदुपशामात्‌ अन्यासां । ५ 
धः त ज । चा शव्द. भत्यक ५ यपशमिक वेत्यादिना कमेण । आराधंतस्स आ- (| || भाश्वासः 
| राधयत । दवे भवेत्‌ । सम्मत्तारादणा सस्यक्त्वायघना । पढमा मथमा । "मविरदसम्मादिही मरति चाखमरण". || 
{|| इत्युक्तं 1. तघ्ाचिर्त्रदणं सम्यम्टर्विदोपत्वेनोपात्त । तिन दि विशेष्येण श । तथामार्व्रतीतपदा्थयोवि- [ ५ ह: 
राधनामभिषत्त - |; 
मूरा ०-सच्छ तत्र । तेषु आगमप्रसिद्धेषु चरिषु सम्यक्त्वेपु मध्ये यात्काचिदेकमाराधयतः सम्यक्त्वाराधना भवेत्‌ । ११ 
इति पदधटना । उवसमियसम्मत्तभित्यादि अनतातुवर॑धिचतुष्कमिध्यात्वसम्यक््मिथ्यात्वसम्यक्त्वाना उपश्माजातं | ५ 
विपयताभिन्विशविविक्तमात्मखरूपटक्षणं तत्वाथैश्द्धान ओौपञषमिकं । तेषामेव क्षयात्‌ क्षायिक । तेपामेव च पण्णायु | 
द्यामावलक्षण॒क्षयेऽलुदयप्राप्नाना सन्मात्ावस्थितिलक्षण चोपङमे तथा सम्यक्त्वदेशधातिस्पद्धैकोदये सत्युत्यन्न | 
सम्यक्त्थं क्षायोपकश्शमिक । छोका--- ५ 
पाकादशतनसम्यक्त्यमक्ेरदयक्षये ॥ (2) 
शमे च वेदकं पण्णामगाढं मलिन चर ।॥ १ ॥ ||; 
बृद्धयष्टिरिवात्यक्तस्थाना करते स्थिता ॥ । ¢: 
स्थान एव स्थित कंप्रमगादं वेदकं तथा ॥ २ | षः 
स्वकारितिऽदवैत्यादौ देवोऽयं मेऽन्यकारिते ॥ | 
अन्यस्यासाविति कय पे चेष्टते ॥ ३॥ (१) 
सछिनं मलसंगेन युद्धं स्वणैमिवोद्धवेत्‌ ॥ ४ ॥ | १ ११८ 
ठसल्कल्ञोकमाखाञु जर्मेकभिव स्थितम्‌ ॥ (ध 
नानात्मीयविशेपेपु चरतीति चछ यथा ॥ ५ ॥ ५ 
धः 





शूलाराषना 
११९ 


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५ ० 1 0.6 1१0. 
कसा ननि एए ४5८८ ए 


समेऽप्यर्नतशक्तत्वे सर्वेषामदैवामय ॥ 
देबोऽस्मै प्रसुरेपोऽस्मा इत्यास्था सुदृशामपि ॥ ६ ॥ 





जीवे चिना आराधना होती दही नहीं अतएव पथम सम्य्दशनाराधनाका आचा बणन करते दै-- 

दिन्दी अर्थ वीचके घरमे यारमरणका वणन किया दे. उस मरणका स्वामी सम्यग्दन आराधनाका 

अराधन करमेवाटा जीव है. अतः वारमरणका सम्यण्द्नके साथ सवथ सिद्ध है, उयश्चमसम्यक्त्व, श्रायिक 
सम्यक्त्व ओर क्ायोपदमिक सम्यक्त्व इन तीन आराधनाअमिसे किसी भी सम्यण्दशनकी आराधना करनेवारा 


किंतु सोपाना दी उसको योध रोता दै शब्दका श्रवण कनेक अर्मतर जो अथ बुद्धीमं श्ललकता न बह 
शब्दका अथ केसे माना जायगा १ बुद्धीमे न क्षटकनेवाला भी अर्थ यदि माना जायेगा तो अगुक शब्दका अपक दी 
अथ होता दै एेसी अर्थव्यवस्था नदीं शेगी. अथात्‌ गोशब्दका अर्थ जसा गाय होता दै वैसा भस, षोड वगर भी 


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(1 ¢ ॐ "1 
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मश्व 


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मूकाराघना || || उनके अर्थं 
१२० 


होगे. अतः सामान्य पदां दी शव्दका वाच्य होता है यह मत मानना चादिये, 

| _ विशेष पदार्थ ही रब्दका अर्थ दै पेसे मतका विवेचन इस प्रकार है-जगतमे रोक किसी प्दार्थका महण [ 
| करते दै किसौका त्याग करते ह ओर्‌ फिसीकी उथेश्षा करते दै पेसा व्यवहार देखनेमे आता है, इस व्यवहारे । 
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विरोषका बाचक दै, अर्थात्‌ न्द सामान्य शौर मिदोष दोनो पदार्थो वाचक ह एसा जनयो मत दै, । 
एतः अस्तुत नयम्‌ सम्बक्त्वराधनामे क्या सामान्य सम्यक््वका ग्रहण करना चाये १ अथवा उसके | 





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सुम्यद्मिथ्यात्व रेते सात कर्म ्रकृतिओंका उपम लोनेसे जो तत्वोके उपर भद्धान दोता दै उसको ,आओपञ्चमिक 1 
व सात प्रदृतिर्योका क्षय दोनेसे जो जीवादि सात तत्के उपर श्रद्धा होती { 1 

है, . 

है वह क्षायिक सम्यक्त्व त व त | 


सलाराषना 
१२१ 


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ठे धद्धाति दत्ययोगव्यवच्छेद" । स जीवः सम्मादेी सम्यण्टणटिशब्दवाच्य इति भतीतपदा्थकत्वमाददिीतं । सद्दि 0 


चद्धाने करोति । असन्भावमपि असत्यमप्यर्थं । य त । गकं ? विपरीतमनेनोपदिष्मिति । |! 
चचनेन श्रि नियोगः कथनं । सर्मशणी- ॥|१। 
तस्यागमस्याथै. आचा्यपरपरया अविपरीत. श्ुतोऽवधृतच्धानेन सूरिणा उपदिष्टो ममेति स रुचिरस्या- ॥: 


रोव्यौख्यातुरस्यायमथं, ति कथनान्चियुज्यते थरतिपत्या 
स्तीति । आक्नाखचितया सम्यग्दिर्भवययेवेति भावः। 











् 


त वाच्य होता दै इस प्रश्रका उत्तर आचार्य देते ह~ 
~ छ? आगमक्रा अधात्‌ जीवादि पदाथोके स्वरूप का जो श्रद्धान करता 
४ व ५ -बचनाकी यमाण मानकर जीवादि असत्य स्वरूप से विवास रखता हवा 








4 


० 2९02 02 


वः 


[॥ 
[॥ 
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एनमेव 


^ प्रवचन › कट्‌ सक्रते दै. 

गाधामे जो ह शब्द द उसकी" सददद इस फियापदके आगे योजना करनी चाहिये, अथौन्‌ विवेचित 
जिनागमके जीवादि अर्थम जो श्रद्धान करता ही दै वह सम्बण्चटि है एेसा आभिमाय उससे व्यक्त दोता दै. 

यह सम्यग्दृष्टि जीव असत्य पदाथका मी श्रद्धान करता है परत वह तव तक असत्य पदार्थे उप्र 
्रद्धान करता है जव तक वह गुरुने मेरेको सत्य पदार्थका स्वरूप कटा दै यदह नदीं जानता है, जब तक वह 
असत्य पदारथकर श्रद्धान करता है तवतके उस गुरने आवार्थप्रंपराके अलुसार भिनागमके . जीवादितत्वका 
स्वरूप कहा है भौर जिनेद्र भगवानकी आज्ञा प्रमाणभूत माननी चाहिये एेसा भाव हृदयमे रखता दै अत उसके 
सम्यग्द्न्म दानि नही है. बह भिथ्याद्ष्टि नहीं गिना जाता है. 

४ सर्बजञकी आन्नाके उपर उसका प्रेम रहता है, बद आज्ञारुचि दोनेसे सम्यण्च्टि दी दै, एेसा इस गाधाकरा 

अव #॥ | 


००.०2 ८ ०40 ००2 प 
[१ 


नकप ण पणव ण एण एनया न्वा एनय वमया = क 


न 0 १ 0 र क ~ 


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१२३ 


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मेप विपरीतं अरतिप्यमानोऽपि सवेदा सम्यन्टषिरिव ? नेत्याद-- 
खत्तादो तं सम्मं द्रसिजंतं जदा ण सदहदि ॥ 
€< सो चेव हवई मिच्छादिट्टी जीवो तदो पहुदि ॥ ३३ ॥ 


मूलाराघना आश्वासः 


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१ 


विजयोदया-ुत्तादो इति । सुत्चादो सूत्रात्‌ । त आत्मना पवैपरीते शददीतमथं । सम्म सम्यक्‌ अविपरीतङ्‌. 
पेण । द्रसिञ्नतं दद्यैमाने रूप्यमाण अन्येन माचारयेणं । जदा यद्‌ यस्मिन्काखे । न सद्ददि न दधाति । सो 
चेव स प्व सम्यग््टितयोक्त, । मिच्छादिष्टी दवद मिथ्यारष्िभैवति । आप्ताक्ञाशरद्धानवेकर्पात्‌ अथयाथात्म्या- 
धद्धानाश्च । तदो तत. । पदि प्रभेति आरभ्य । असंदिग्धसूजातरदरदितार्थाधद्धानादारभ्येति यावत्‌ । 








किमेप विपरीतं परतिपयमानोऽपि सर्वदा सम्य्षटिरिव नेत्याद-- 
मूखारा-खुत्तादो सूतरा्रणधरायन्यृत्तमग्रथितमागममाभनि्यत्यथः । तं परथमगुरूपदेशेन भिथ्याप्रतिपननमर्थ सम्म द्र्‌- 
सिज्जतं अन्येन गुरुणाऽविपरीतं पररूप्यमाणं । सो चेव स एव सम्यग्टष्टितयोक्तो मिध्यादृष्टि्मवति। आप्ता्ञाधर- 
द्धानवेधुयोद्थयायत्म्याशरद्धानाव । तदो पहुदि । असंदिग्धसूत्रातरदर्िताथौश्रदधानादारभ्य । 








क्या जीवादि पदार्थोका विपरीत स्वरूप मानता हवा भी यह मेदा सम्यण्ट्टि दी रहता ह अथवा नही? 
इस प्र्नका उत्तर आचार्य देते है-- 
1 


व 
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पर भ्रद्धान न होनेसे बह मिथ्यादटि दी समञ्चा जाता है, 


ञ्छ 





खाद त सम्म दरसिज्जत तयक्तं केन रचितानि खराणि प्रमाणभूलानीत्यत भाद-- 
सुत्तं गणधरगथिदे तहेव पत्तेयवुदधकदिय च ॥ 
सुदकेवलिणा किय अभिण्णद्सयुव्विगधेदे च ॥ ३४ ॥ 
ज्यं प्रयेकेवद्धेन गणेदरोन निवेदित ॥ 
तकेवलिना सूत्रमाभिन्दङापूर्विणा ॥ २३५ ॥ 
विजयोदया-छनत्त गणधर्गधिद व । खच सत्र 1 गणशब्देन स उच्येते । तान्धार्यान्ति दति 


दति । तै" व थित 8 व अत्थ कान्ति भस्दा 
गथ गेधति गणधर इति 1 तदेव तथैव । ष्व च 1 श्युतक्षानावरणक्षयोपरप्रात्‌ 
परोपदेशमतरेणाधेगतक्षानातिदाया प्रत्येकबुद्धा । खदुकेवलिणा समस्तश्चुतधारिणा कथित चेति । अभिषदसुपुन्विकधिद्‌ 
च । दुदपूवाण्य धीयमानस्य विधायुमवादस्था शहछकविद्या मद्ावयाश्च अरा्टप्रसेनाद्याः भ्रपत्यादयच्य तरागत्य रूप 
भव्ये, सामथ्यं स्वकमौभाप्य पुर स्थित्वा याप्या किमस्माभि. कर्तैन्यमिति तिष्ठति । तद्वच. श्युत्वा न भवतीभिरसा- 
कं साध्यमस्तीति ये वदन्ति अचितचिष्वास्ते मभिच्दृशपूर्विण । प्तेपामन्पतमेन प्रथिते खत्र प्रमाण । धरमाणेन केवन 
शरुतेन चा गरदीतमर्थ भरक्तद्धिप्टा सतो यदुपदिरति ततस्तद्धचसां ध्रामाण्यं दूति भाव । श्रमाणपरिदप्टाधगोचरं अरक्त- 
दिएव्दप्रमभव वच प्रमाणं । यथा पितुरर्कद्िएटस्य स्वप्रत्यक्षगोचरं वच. घटोय रत्य इति । तथा च गणधराद्रीना चच 
श्रमाण परिदृ्टाथगोचर । अरक्तद्धिएवक्वुप्रभव । 


केन रचितं सूत्र प्रमाण स्यादित्यत्रा-- 
गणदरकथिदे--गणा द्वादश यत्याद्यो जिरनद्रसभ्याः । गणान्यारयंति दतिमागोन्मि्यम्नद्ानदिनि 
बृतत्य शिवमार्गे सम्यण्दशषेनादौी खपयन्वीवि ति गणधरा सप्तविधर्दिमाप्ता धमचा्यीः । पत्तेयवुद्रा--एक केव परोप- 
देशनिरपेकष शरुवज्ञानावरणक््योपशमविशेषं प्रतीत्य बुद्धाः सं्ा््तानातिशया. भ््येकबुद्धाः । सुदकेवरिणा संमस्तश्चुत- 
धारिणा । भिन्दसपुभ्वि-द्शा पूर्वाणि उत्प द्पूवांदेषेदय(छवादास्तान्येपा सन्तीति दशूर्विणः । अभिन्ना विय(मिरभच्या 





व्क) = 34 59; 25 ०.2 1523 ६ ४५ 
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धः वितचारित्रास्ते च वे दश पूर्विणश्च | वियालुबाद्पि स्वयमागतद्वाद्शशतविद्याभिस्वङितचारित्रा इत्यर्थः । 








ूराराषन || ि | ( य्वा 
१२६ व क ' देषा गामे वाक्य आया है परंतु प्रमाणभूत र्नोकी स्वना | ( १ 
५ 1 की दै १ पेसा प्रश्न होने पर आचा उत्तर दे है || 
0 (य दी अर्थ-गणधररचित आगमको च कते ६, यत्येकबुद्ध ऋपिओके दारा सचे गये आगमको भीष || 
| कते ई, श्तकेवरी ओर अभिर दपूरवथारक आचारयोकि रच हुए आगम्‌ ग्॑थको मी घ्र कहते ई. | 1 
छ विरेपाथ--गणके वारा प्रकार है, चोदापूष जाता यनि, विक्रियाद्धिके धारक न, उ | € 
|| मुनि, सनःपरथयज्ञानी युनि, वाद करेवा युनि वरे वारा गण उनको रल्नव्रयथ्का उपदेश देकर जो | | 
दुगैतीसे बचति द उनको गणधर पते टै, गणथरोको सात ऋद्धियां प्रान होती उनके नाम इसप्रकार है -- || 
बुद्धि, तप, विक्रिया, ओपधि, रस, बल आर अक्षीण ेसे सात ऋ्धिको प्रप हुए गणधरोको भेरा नमस्कार हो ध 
गथ र दष आमक त कदत दै, केवलिोनि का हुवा अथं गणधर ग्रथित करते दै इस मिपयमे † अत्थं | 
करति अरहा भथ गन्ति गणहरा तेसं › अर्थात्‌ केवलि भगवान जो अर्थं कते दै उसका गणधर देव आगमे | {4 
न्‌ परते £ ्रलयुद चियोन शवे हए शासको भी घ कहते है तक्ञानावरण वर्मका क्षयोपय॒म | ५ 
दोनेसे ग॒स्पदेदाके विना जिनको सातय ज्ञान होता दै एसे महपियोफो प्रत्यकवुद्ध॒ कहते है, दादशांगशरत ||; 
पनस भाण करेवा महपियोको तेवर कते द, उनका हा हुवा ओ आग बह भी न ह, | 
अभिनदूमे चाननवारे आचये सचे हए यास्को भौ. दत बहते ह, ववो अध्ययन करते (| 
समय विदयाजुवादमे जिनका वर्णन दै एसी अंगुषमतेनादि शक विद्या च परञप्त्यादि महाविद्या इन आचायि |:/; 
1 श जाजी द तथा वे अना स्म दिखाकर साम्यं ओर अपने करका सस्ता | होकर हे | 
` | 1.1.111 1 १२६ 


|| नदी ६ एसा जो अपि निथलयिच् होकर बोरे है, उनो अभिजदशाू्वपर मपि कहते है उपर्युक्तं कटे 
| ऋपियोके आगमोंको घत कहते दै र 
(9 यत्यक्षादिक भरमाणो दारा, केवरन्ञानके दारा ओर इतक्ञानके दारा जाना डवा वस्तुक स्वरूप रागद्वेष 





22 


सतोऽ 


अविपता्थकथनकारिणो टठक्षणमादोच्तरया गाथया- 


< «4 द्‌ ग्धच्द 
चारततं खलु धम्मो धम्मो जो सो समोच्ति णिदिष्ठो ' इति वचनात्‌ ! ततो मद्चारित्र ह्यथ 1 अच्छुवदेसम्दि सृत्ा- 
थव्याख्याने ? भयणिज्जो भाज्य । यदि सूष्राुसारि युक्त्ययुगतं वा तद्धशाख्यान व्राष्यमन्यथा नेति यावत्‌ । 


[= 
भवतु नामिपा अन्यतमन प्रणीत सूञ श्माणं तदर्थकथन तु को विपरीत करोति को वाऽधैपरीतमित्यरकाया 


गिदिदत्थो संविग्गो अच्छुवदेसेण संकणिजो हु ॥ 








प्रसाणप्रिदृष्टायैगोचरत्वेन रागदेणाजुषदतवक्श्रभवत्वेन च ॒पितव्रादिवाक्यवत्ममाणमूतस्यापि सूत्रस्या्थं यो 
यथावत्कथयति तं ठक्षयति- 


गीदत्यो-- सम्यग्युरूपदेशादवधारितसूव्रार्थ, 1 संविग्यो रागाद देप सूत्राथेमन्यथोपदिशवो मम भिध्यादृष्टेः 
टं संसारे परिभ्रमण भविष्यतीति भयमापन्नः । अच्छुबदेसे सूत्रथिव्याख्यानविपये । ण संकणिज्नो खु । 


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प 2 <; 
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आश्वा 





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४ आश्वासः 


( || नैव शकनीय । य यथायं व्याचष्टे सूत्राथ स तथेवेति मन्तव्यः ! सो चेव गीतार्थं एव । मदधम्मो सातिचारचारित्रः । ५ 
|| 


१ || भयीणजञ्जः भाज्यः । यदि सृत्राजसारी युक्तियुक्त व तद्याख्यानं ततो मह्यं नान्ययेत्य्थः । 


भवयत 








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9 „ .इन महर्पियोमिसे किपीके भी बने दए घर हम प्रमाण मानते है. परत इनका अर्थका कथन करनेवाले |! 
{| हम किसको सत्याथं प्रतिपादन करनेवाला समनने थर किसको न समच { सी शंकाका निरसन करते दे, | 6 
(1 प [षु ५५ ०५ च 


|| संविष् कते दै. उसको श्रव्रारथके कटनेमे भमाणता दै परंतु जिका चाख्र संद दै उसको सूतराधनिरूपणमे प्रमाण | 
६। (= (3 ^~ ^, च 
14|| मानना विकल्पनीय हे, अर्थात्‌ यदि उसका व्याख्यान पनदुसार आर युक्तियुक्त हो तो ग्रहण करना चाद्यि, वेसा | 
|| न हो तो ग्रहण करना नदीं चाहिय, 





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क 7 चा रत्वा धद्धावान्य सर एव च सम्यण्टष्टि , स एव. सम्यक्त्वाराधक एत्यारेकाया - ॥ 
धम्मा धम्मागासाणि पोग्गटा काट्दव्व जीवे य ॥ 
आणाए सदहन्तो समत्ताराहओ भणिदो ॥ ३६ ॥ 

सिद्धाः संसारिणो जीवाः परयातः सिद्धिमेकधा ॥ 

क्षया जिननाधानां ओद्धेयाः उद्धदथिना ॥ ३९ ॥ 


६, 
4 
विजयोक्या- -धम्बाघस्मागासाणिचि जीवपुर स्वावस्थिताकाशदेदादेशान्तर प्रतिगति" परिस्पद्पर्यायै || 

परययोगत स्वभावतो वा विद्यते । यन्येपा निष्कियतेत्ति न गतिरस्ति । 






धना & | तथापि न तत्न धर्मशब्दस्य एत्ति. । अरतिनियतवियया रूढय. शत्युक्तमेव । मथवा स्थितेख्दासीनदेवत्वादधम । 
9 न च जीवादीना स्थितैष्दासीनदेतुत्वमस्ति । तिताघुभावपि असख्यातप्रदेरौ पकतामेवोद्धदन्तौ खषक्ष्मौ नि क्रियौ 
१२९ रयादिरदिता । यक्राश अनेतथदेशाध्यासितं सर्वेषा अचकाशदानसामथ्योपित । पुदरकस्व रूपरसगघस्पशवत अरु 








क प्रमाणादिसुखेन सम्पचं प्रवचना्ैमधिगम्य श्रदधानः सम्यक्त्वस्याराधकः स्यादुतान्योऽप्यस्ति इति 


अघ्राद- 

मूढारा - धम्मा इत्यादि - जीवपुद्रल्योः साधारण्येन गतिनिमित्तं धमेः । तयोरेव साधारण्यन स्थितिदेतु- | {# 
रथम; । सवैपामवकाशदायकं आकरादाम्‌ । रूपिण पद्रः । वरेनाठक्षणः फाल. । चेतनाठक्षणो जीवः । एतान्पडव 
पयोयत्वादूदरन्याणि । आ्ञयापि पदद्रन्याणि संति इत्याप्तवचनवलेनापि श्रदधानः सम्यक्त्वमाराधयतीत्युक्तः । 


सवपा युगपद्रतिस्थितिपरीणामावगाहदान्यथा- 

योगाद्धमतद्न्यकालगगनान्यात्मा त्वत्ययात्‌ 
सिद्धयेत्स्वस्य परस्य वाक्प्रमुसतो मूवेत्वतः पुद्रक- 
स्ते द्रव्याणि पडेव पयेयरुणात्मान" कथंचिदूपरुवाः ॥ 








+ उपरके पेज १२८ की गाथा न॑. ३६ फे नीचे जो श्छोक आया है वहम यद्‌ च्छोक आना चाद्ये था 
अगर आगेकी गाथा अवर ३७ के आगे गाथा नं. ३६ के नीचे बाडा शोक आना चाद्ये | गठतीसे ये उच्टे खगा 
गये है । सखये यद्‌ शोक यदापर ठगा दिया गया दै पाठक सुधार कर पटेगे एेसी आक्षा दै । 


त 


१७ 





| भ्द्धान करनेवाला आत्मा सम्यक्त्वका आराधक होता दै. 





सविस्तर आगमन ओर उसके अर्थको जानता दुआ जो उसके उपर श्रद्धा रखता हे कया बही सम्य- 


टिनदी अर्थ-- धर्म, अध, आकार, प्ल) काट, व जीव इन चद ्रन्योको भिनेश्वरकी आज्ञासे 


शः विशेयार्थ - जीव ओर पूद्रल ये दो पदार्थं जहां रहे रै एेसे आकाशम्रदेशसे प्रदेदं तरम दुसरेके निमिततसे 
(8 अथवा स्वभावत मन कले दै, इन दो ठँ न्म रामल धर. परह ध्म, अधर्म, काप्य जौर कार इन 


९ || उदासीन कारण दै वैसा जीव गामे उदासीन्‌ नहीं द. बह दुसरेको यतिकाये प्रक होता दै इस छथि व 
१; || स्पसे गतिरेव धमद्रन्यमेदी दै अन्यत्र नदी दै 

४८ अधमंद्रव्य जीव पुद्धरके सिरता उदासीन कारण दै, उदासीनरूपसे खितीको दतु हो जाना यह 
व सिवाय अन्यद्रन्यमे नरी पाया जारा दै हे, धम॑द्रव्य ओर अधर्रन्पके असंख्यात ५ 

ये श्रदेश्च आपसे मिलकर एकताको प्राप हये दै, ये द्रव्य द्म, निःक्रिय ओर रूप, रस, गंध 

नाह र पवय क 

{9 आकराद्च द्रव्य अनत परदेशी है, सपू दरवयोकों अवकाश देनेका साम्य इसमे है, घल स्प, रसः, गभ, 
|| खयै इन गणो यक्त रहता दै. उसके अणु ब स्वंपरसे दो भेद दै. काठके व्यवदारकाल ब॒ निधयकार एसे 
(१ दोभेद्‌रहै, १ दशनोपयोगमय दे. देसे छद दर्व्योका 1 जिनेश्वरकी. आज्ञासे जो भ्रद्धान करता है वह 





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१४ ॥ आश्वापः 


० | गदि है १ वदी सम्यक्त्वाराधक दै १ एसी शंका होनेपर आचार्य अन्य भी सम्यग्दृष्टि रोता हे देसा आगेकी || 
¢| मायामे उत्तर कते है-- 


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जीवाधद्धाने सुक्तिसंसारविपयपरिप्ाप्तित्यागाथौयासायुपपत्तेरिति भाव । 
नात्‌ परिक्रानसदवारि धद्धान नोत्पघ्न तथापि नासौ मिध्यारिदरनमोदोदयस्य अश्रद्धानपरिणामस्याक्षानविपयस्याः 
भावात्‌ । न हि धद्धानस्यालुत्पत्तिरथद्धान इति गृद्ीत । शरद्धानादन्यदश्द्धान दमित्थमिति शुतनिरूपितेऽसुचि. । 


यदि नाम धममादिद्रव्यापरिक्षा- 








& यह शोक पज १२८ की ३६ षीं गाथा के नीचे गङतीसे छग गया ह वस्तुतः यद्या टी चाहिय । 


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. ऋ 3. त 
2 थः पथा एर ०8 148 ण्ट 191६५ ५ एम 

क 1 3 8 11 3 


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गा २९५, 
प भोः ष्णात १०२) 18 ५४ १४८ ००४ ५।०)४ ०९ 10 148 1110-6 4 
॥ ४ श ०९००४ 
॥ ०९6५५ 9 1५2५।०1।०6 1 
॥ ९९९४ + 11510 4105 |+ 1 





: 11*195 





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